श्लोक-विश्लेषणम् — शाब्दबोधः
श्रीमद्भागवतपुराणस्य द्वितीयस्कन्धस्य चतुःश्लोकी-भागवत-प्रसङ्गे भगवान् विष्णुः ब्रह्माणं प्रति इदं वचनं वदति। अस्य श्लोकस्य व्याकरण-छन्द-अलंकारादि-दृष्ट्या विश्लेषणं अधः क्रियते।
१. पदच्छेदः (Padaccheda)
यावान् | अहम् | यथाभावः | यद्रूपगुणकर्मकः | तथा | एव | तत्त्वविज्ञानम् | अस्तु | ते | मदनुग्रहात् ||
२. सन्धि-विग्रहः
| सन्धि-पदम् | पूर्वपदम् | उत्तरपदम् | सन्धि-प्रकारः | सूत्रम् | वृत्तिः |
|---|---|---|---|---|---|
| यावानहम् | यावान् | अहम् | संयोगः | - | हलन्त्यस्य स्वरेण मेलनम्। |
| यथाभावो यत् | यथाभावः | यत् | उत्व-सन्धिः | ८.२.६६ ससजुषो रुः, ६.१.११४ हशि च | विसर्गस्य स्थाने रेफः, ततः उकारः, अ+उ मिलित्वा ओकारः। |
| तथैव | तथा | एव | वृद्धि-सन्धिः | ६.१.८८ वृद्धिरेचि | आ + ए = ऐ। |
| मदनुग्रहात् | मत् | अनुग्रहात् | जश्त्व-सन्धिः | ८.२.३९ झलां जशोऽन्ते | पदान्त-तकारस्य दकारः। |
३. समास-विग्रहः
| समासपदम् | विग्रहवाक्यम् | समास-प्रकारः | उपपदानि | सूत्रम् | वृत्तिः |
|---|---|---|---|---|---|
| यथाभावः | यथा भावः यस्य सः | बहुव्रीहिः | यथा, भाव | २.२.२४ अनेकमन्यपदार्थे | अन्यपदार्थे वर्तमानं सुबन्तं समस्यते। |
| यद्रूपगुणकर्मकः | यत् रूपं गुणाः कर्माणि च यस्य सः | बहुव्रीहिः | रूप, गुण, कर्म | २.२.२४ अनेकमन्यपदार्थे | (कप् प्रत्ययान्तः) |
| तत्त्वविज्ञानम् | तत्त्वस्य विज्ञानम् | षष्ठी-तत्पुरुषः | तत्त्व, विज्ञान | २.२.८ षष्ठी | सुबन्तं षष्ठ्यन्तेन सह समस्यते। |
| मदनुग्रहात् | मम अनुग्रहः, तस्मात् | षष्ठी-तत्पुरुषः | अस्मद्, अनुग्रह | २.२.८ षष्ठी | षष्ठी सुबन्तेन सह समस्यते। |
४. शब्दरूप-विश्लेषणम्
| पदम् | प्रातिपदिकम् | अर्थः (English) | लिङ्गम् | विभक्तिः | वचनम् | कारकम् | सूत्रम् | वृत्तिः |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| यावान् | यत्-वतुप् | As great as | पुंल्लिङ्गम् | प्रथमा | एकवचनम् | विशेषणम् | २.३.४६ प्रातिपदिकार्थ… | प्रथमा विभक्तिः। |
| अहम् | अस्मद् | I (The Lord) | पुंल्लिङ्गम् | प्रथमा | एकवचनम् | कर्ता | २.३.४६ प्रातिपदिकार्थ… | कर्तरि प्रथमा। |
| यथाभावः | यथाभाव | Of such nature | पुंल्लिङ्गम् | प्रथमा | एकवचनम् | विशेषणम् | २.३.४६ प्रातिपदिकार्थ… | प्रथमा। |
| ते | युष्मद् | To you | पुंल्लिङ्गम् | चतुर्थी | एकवचनम् | सम्प्रदानम् | २.३.१३ चतुर्थी सम्प्रदाने | सम्प्रदाने चतुर्थी। |
| मदनुग्रहात् | मदनुग्रह | By my grace | पुंल्लिङ्गम् | पञ्चमी | एकवचनम् | हेतुः | २.३.२३ हेतौ | हेत्वर्थे पञ्चमी। |
५. धातुरूप-विश्लेषणम्
| क्रियापदम् | मूलधातुः | गणः | अर्थः (संस्कृते) | अर्थः (English) | लकारः | पुरुषः | वचनम् | पदम् | प्रक्रिया | सूत्रम् | वृत्तिः |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अस्तु | अस् | अदादि | भुवि (सत्तायाम्) | To be / Let it be | लोट् | प्रथमः | एकवचनम् | परस्मैपदम् | अस् + लोट् | ३.३.१६२ विधिनिमन्त्रण… | आशीर्वाद-प्रार्थनादिषु लोट्। |
६. कृदन्त-तद्धित-विश्लेषणम्
| पदम् | प्रकृतिः | प्रत्ययः | प्रत्यय-प्रकारः | अर्थः (संस्कृते) | अर्थः (English) | सूत्रम् | वृत्तिः |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| यावान् | यद् | वतुप् | तद्धित | यत्परिमाणमस्य | As much/great | ५.२.३९ यत्तदेतेभ्यः परिमाणे वतुप् | परिमाणार्थे वतुप्। |
| विज्ञानम् | वि + ज्ञा | ल्युट् | कृत् | विशिष्टं ज्ञानम् | Realization | ३.३.११५ ल्युट् च | भावे ल्युट् प्रत्ययः। |
७. अव्यय-परिचयः
१. तथा — (तथा-प्रकारवाचकम्) — उसी प्रकार। २. एव — (निश्चयार्थकम्) — ही।
८. कारक-विभक्ति-सम्बन्धः
| पदम् | विभक्तिः | कारकम् | कारक-सूत्रम् | विभक्ति-सूत्रम् | सम्बन्धि-क्रियापदम् |
|---|---|---|---|---|---|
| अहम् | प्रथमा | कर्ता | १.४.५४ स्वतन्त्रः कर्ता | २.३.४६ प्रातिपदिकार्थ… | अस्तु (अस्मि) |
| ते | चतुर्थी | सम्प्रदानम् | १.४.३२ कर्मणा यमभिप्रैति… | २.३.१३ चतुर्थी सम्प्रदाने | अस्तु |
| मदनुग्रहात् | पञ्चमी | हेतुः | - | २.३.२३ हेतौ | अस्तु |
९. अन्वयः (Prose Reordering)
अहं यावान्, यथाभावः, यद्रूपगुणकर्मकः (अस्मि), मदनुग्रहात् ते तत्त्वविज्ञानं तथा एव अस्तु।
१०. श्लोकार्थः
(क) प्रतिपदार्थः — अहम् (मैं) यावान् (जितना व्यापक हूँ), यथाभावः (जिस स्वभाव वाला हूँ), यद्रूपगुणकर्मकः (जिस रूप, गुण और कर्मों वाला हूँ), मदनुग्रहात् (मेरी कृपा से) ते (तुझे) तत्त्वविज्ञानम् (उसका वास्तविक अनुभव/ज्ञान) तथा एव (वैसा ही) अस्तु (होवे)।
(ख) भावार्थः (Professional Sanskrit Prose) — अत्र भगवान् पुरुषोत्तमः सृष्टिकर्त्तारं ब्रह्माणं प्रति स्वकीय-स्वरूपस्य याथार्थ्य-बोधाय वरं ददाति। भगवतः स्वरूपं अनन्तं, अचिन्त्यं च वर्तते। कोऽपि जीवः स्वप्रयत्नेन ईश्वरस्य पूर्णं स्वरूपं ज्ञातुं न शक्नोति। अतः भगवान् कथयति यत् मम स्वरूपं (यावान्), मम सत्ता (यथाभावः), मम दिव्य-विग्रहाः (यद्रूपः), मम कल्याणगुणाः (यद्गुणः) तथा च मम सृष्ट्यादि-लीलाः (यत्कर्मकः) — एतत् सर्वं यथावत् अस्ति, तथैव तव बुद्धौ स्फुरतु। अत्र ‘मदनुग्रहात्’ इति पदेन इदं ध्वन्यते यत् भगवत्तत्त्व-विज्ञानं केवलं शास्त्र-पाण्डित्येन न लभ्यते, अपितु भगवतः अहैतुक-कृपयैव सम्भवति। अत्र भक्तिरसस्य पुष्टिः भवति, यतः भक्त्यैव ईश्वरो ज्ञायते।
(ग) हिन्दी अर्थ — मैं जितना व्यापक हूँ, मेरा जो स्वभाव है, और मेरे जो रूप, गुण तथा कर्म हैं, मेरी कृपा से तुम्हें उन सबका वैसा ही वास्तविक विज्ञान (अनुभवजन्य ज्ञान) प्राप्त हो।
(घ) English meaning — May you, by My grace, realize the truth of My actual extent, My nature, and My forms, qualities, and activities exactly as they are.
११. छन्दः (Metre)
छन्दस्-नाम: अनुष्टुप् (श्लोकः) अक्षर-गणना: पाद १ — ८ अक्षराणि (या-वा-न-हं य-था-भा-वो) पाद २ — ८ अक्षराणि (य-द्रू-प-गु-ण-क-र्म-कः) पाद ३ — ८ अक्षराणि (त-थै-व त-त्त्व-वि-ज्ञा-न-) पाद ४ — ८ अक्षराणि (म-स्तु ते म-द-नु-ग्र-हात्) कुल अक्षराणि = ३२। लक्षणम्: “पञ्चमं लघु सर्वत्र सप्तमं द्विचतुर्थयोः। गुरु षष्ठं च पादानां शेषेष्वनियमो मतः॥“
१२. अलङ्कारः
यथासङ्ख्य अलङ्कारः: यहाँ ‘यावान्’, ‘यथाभावः’ आदि के क्रम से ‘तथा एव’ के द्वारा ज्ञान की प्रार्थना की गई है।
१३. रसः
भक्ति-रसः / शान्त-रसः: भगवान् और भक्त (ब्रह्मा) के संवाद में ईश्वर के प्रति अनुराग और ज्ञान की प्रधानता है।
१४. स्रोत-सन्दर्भः (Source Authentication)
प्रमाणितम् — श्रीमद्भागवतपुराणम् · द्वितीयस्कन्धः · नवमोऽध्यायः · श्लोकः ३२ (२.९.३२)। (यह प्रसिद्ध ‘चतुःश्लोकी भागवत’ का द्वितीय श्लोक है, जहाँ भगवान् ब्रह्मा जी को उपदेश दे रहे हैं।)
१५. दोष-परीक्षा (Error Audit)
कोऽपि दोषः न दृश्यते — सर्वं शुद्धम्। व्याकरण-दृष्ट्या छन्दो-दृष्ट्या च श्लोकः निर्दोषः अस्ति।
श्लोक-विश्लेषणम् — शाब्दबोधः
श्रीमद्भागवतपुराणस्य सुप्रसिद्धे ‘चतुःश्लोकी-भागवते’ अयं प्रथमः श्लोकः अस्ति। अत्र भगवान् स्वस्य अद्वैत-स्वरूपस्य तथा च जगतः कारणत्वस्य वर्णनं करोति।
१. पदच्छेदः (Padaccheda)
अहम् | एव | आसम् | एव | अग्रे | न | अन्यत् | यत् | सत् | असत् | परम् | पश्चात् | अहम् | यत् | एतत् | च | यः | अवशिष्येत | सः | अस्मि | अहम् ||
२. सन्धि-विग्रहः
| सन्धि-पदम् | पूर्वपदम् | उत्तरपदम् | सन्धि-प्रकारः | सूत्रम् | वृत्तिः |
|---|---|---|---|---|---|
| अहमेवासमेवाग्रे | अहम् + एव + आसम् + एव + अग्रे | - | संयोगः, सवर्णदीर्घः | ६.१.१०१ अकः सवर्णे दीर्घः | अ + अ = आ; ए + अ = एवाग्रे। |
| नान्यद्यत् | न + अन्यत् + यत् | - | सवर्णदीर्घः, जश्त्वम् | ६.१.१०१, ८.२.३९ | अ + अ = आ; त् + य = द्य। |
| सदसत्परम् | सत् + असत् + परम् | - | जश्त्व-सन्धिः | ८.२.३९ झलां जशोऽन्ते | पदान्त-तकारस्य दकारः। |
| यदेतच्च | यत् + एतत् + च | - | जश्त्वम्, श्चुत्वम् | ८.४.४० स्तोः श्चुना श्चुः | त् + च = च्च। |
| योऽवशिष्येत | यः | अवशिष्येत | उत्व-सन्धिः | ६.१.११३ अतो रोरप्लुतादप्लुते | विसर्गस्य उकारः, ततः पूर्वरूपम्। |
| सोऽस्म्यहम् | सः + अस्मि + अहम् | - | उत्वम्, यण्-सन्धिः | ६.१.११३, ६.१.७७ इको यणचि | इ + अ = य। |
३. समास-विग्रहः
| समासपदम् | विग्रहवाक्यम् | समास-प्रकारः | उपपदानि | सूत्रम् | वृत्तिः |
|---|---|---|---|---|---|
| नान्यत् | न अन्यत् | नञ्-तत्पुरुषः | न, अन्य | २.२.६ नञ् | नञ् सुबन्तेन समस्यते। |
| सदसत्परम् | सत् च असत् च (सदसती), ताभ्यां परम् | द्वन्द्वगर्भ-तत्पुरुषः | सत्, असत्, पर | २.२.२९ चार्थे द्वन्द्वः | उभयपदार्थप्रधानो द्वन्द्वः। |
४. शब्दरूप-विश्लेषणम्
| पदम् | प्रातिपदिकम् | अर्थः (English) | लिङ्गम् | विभक्तिः | वचनम् | कारकम् | सूत्रम् | वृत्तिः |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अहम् | अस्मद् | I | पुंल्लिङ्गम् | प्रथमा | एकवचनम् | कर्ता | २.३.४६ प्रातिपदिकार्थ… | कर्तरि प्रथमा। |
| अग्रे | अग्र | In the beginning | अव्ययवत् | सप्तमी | एकवचनम् | अधिकरणम् | २.३.३६ सप्तम्यधिकरणे च | कालवाचक-सप्तमी। |
| अन्यत् | अन्य | Other | नपुंसकम् | प्रथमा | एकवचनम् | कर्ता | २.३.४६ प्रातिपदिकार्थ… | प्रथमा। |
| सत् | सत् | Manifest / Real | नपुंसकम् | प्रथमा | एकवचनम् | विशेषणम् | - | - |
| असत् | असत् | Unmanifest / Unreal | नपुंसकम् | प्रथमा | एकवचनम् | विशेषणम् | - | - |
| परम् | पर | Beyond | नपुंसकम् | प्रथमा | एकवचनम् | विशेषणम् | - | - |
| पश्चात् | पश्चात् | Afterwards | अव्ययम् | - | - | - | - | - |
| एतत् | एतद् | This (Universe) | नपुंसकम् | प्रथमा | एकवचनम् | कर्ता | - | - |
५. धातुरूप-विश्लेषणम्
| क्रियापदम् | मूलधातुः | गणः | अर्थः (संस्कृते) | अर्थः (English) | लकारः | पुरुषः | वचनम् | पदम् | प्रक्रिया | सूत्रम् | वृत्तिः |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| आसम् | अस् | अदादि | सत्तायाम् | Was | लङ् | उत्तमः | एकवचनम् | परस्मैपदम् | अस् + लङ् | ३.२.१११ अनद्यतने लङ् | भूतकाले लङ्। |
| अवशिष्येत | अव + शिष् | रुधादि | विशेषणे | Remains | विधिलिङ् | प्रथमः | एकवचनम् | आत्मनेपदम् | शिष् + यक् | ३.१.६७ सार्वधातुके यक् | कर्मकर्तरि प्रयोगः। |
| अस्मि | अस् | अदादि | सत्तायाम् | Am | लट् | उत्तमः | एकवचनम् | परस्मैपदम् | अस् + लट् | ३.२.१२३ वर्तमाने लट् | वर्तमानकाले लट्। |
६. कृदन्त-तद्धित-विश्लेषणम्
| पदम् | प्रकृतिः | प्रत्ययः | प्रत्यय-प्रकारः | अर्थः (संस्कृते) | अर्थः (English) | सूत्रम् | वृत्तिः |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| सत् | अस् | शतृ | कृत् | विद्यमानम् | Being / Existent | ३.२.१२४ लटः शतृ… | वर्तमानकाले शतृ। |
| असत् | न + सत् | - | - | अविद्यमानम् | Non-existent | - | - |
७. अव्यय-परिचयः
१. एव — निश्चयार्थकम् (Only / Alone)। २. अग्रे — कालवाचकम् (In the beginning)। ३. न — निषेधार्थकम् (Not)। ४. पश्चात् — कालवाचकम् (Afterwards)। ५. च — समुच्चयार्थकम् (And)।
८. कारक-विभक्ति-सम्बन्धः
| पदम् | विभक्तिः | कारकम् | कारक-सूत्रम् | विभक्ति-सूत्रम् | सम्बन्धि-क्रियापदम् |
|---|---|---|---|---|---|
| अहम् | प्रथमा | कर्ता | १.४.५४ स्वतन्त्रः कर्ता | २.३.४६ प्रातिपदिकार्थ… | आसम् / अस्मि |
| अग्रे | सप्तमी | अधिकरणम् | १.४.४५ आधारोऽधिकरणम् | २.३.३६ सप्तम्यधिकरणे च | आसम् |
| यः | प्रथमा | कर्ता | १.४.५४ स्वतन्त्रः कर्ता | २.३.४६ प्रातिपदिकार्थ… | अवशिष्येत |
९. अन्वयः (Prose Reordering)
अग्रे अहम् एव आसम्, यत् सत् असत् परम् (अस्ति, तत्) अन्यत् एव न (आसीत्)। पश्चात् यत् एतत् (जगत् दृश्यते, तत्) अहम् (एव), च यः अवशिष्येत, सः अहम् अस्मि।
१०. श्लोकार्थः
(क) प्रतिपदार्थः — अग्रे (सृष्टि से पूर्व) अहम् एव (मैं ही) आसम् (था), यत् (जो) सत् (स्थूल) असत् (सूक्ष्म) परम् (और इन दोनों से परे/कारण) अस्ति, तत् अन्यत् (वह दूसरा कुछ) न (नहीं था)। पश्चात् (सृष्टि के बाद) यत् एतत् (जो यह जगत् है) अहम् (वह मैं ही हूँ), च (और) यः (जो प्रलय के बाद) अवशिष्येत (बच रहता है), सः (वह) अहम् अस्मि (मैं ही हूँ)।
(ख) भावार्थः (Professional Sanskrit Prose) — अस्मिन् श्लोके भगवान् श्रीकृष्णः आत्मनः नित्यत्वं अद्वैतत्वं च प्रतिपादयति। सृष्टेः प्राक् केवलं परमात्मा एव आसीत्, तदानीं कार्य-कारण-रूपं किमपि अन्यत् वस्तु नासीत्। सृष्टिकाले अपि यत् इदं चराचरं जगत् दृश्यते, तत् भगवतः एव विवर्तः अथवा शक्ति-विक्षेपः अस्ति, अतः वस्तुतः तत् भगवद्रूपमेव। प्रलयकाले यदा सर्वं विनश्यति, तदापि यः अविनाशी तत्त्वरूपेण अवशिष्यते, सः परमात्मा एव। एतेन सिद्धं भवति यत् जगत् आदि-मध्य-अन्तेषु भगवन्मयं वर्तते। अत्र ‘सत्’ पदेन व्यक्तं जगत्, ‘असत्’ पदेन अव्यक्तं कारणं, ‘परम्’ पदेन च ताभ्यां विलक्षणं ब्रह्म सूचितम्।
(ग) हिन्दी अर्थ — सृष्टि के आरम्भ में केवल मैं ही था। मेरे अतिरिक्त न सूक्ष्म था, न स्थूल और न ही दोनों का कारण (प्रधान/प्रकृति)। इस समय जो यह जगत् प्रतीत हो रहा है, वह भी मैं ही हूँ और प्रलय होने पर जो शेष बचेगा, वह भी मैं ही हूँ।
(घ) English meaning — Prior to the creation, I alone existed. There was nothing else—neither the cause, nor the effect, nor that which is beyond both. That which exists now as the universe is also I, and that which remains after dissolution is also I.
११. छन्दः (Metre)
छन्दस्-नाम: अनुष्टुप् अक्षर-गणना: ३२ अक्षराणि (८ प्रति पाद)। लघु-गुरु चिह्नम्: पाद १: अ(L) ह(L) मे(G) वा(G) स(L) मे(G) वा(G) ग्रे(G) — ८ पाद २: ना(G) न्य(G) द्य(G) त्स(G) द(L) स(L) त्प(L) रम्(G) — ८ पाद ३: प(L) श्चा(G) द(L) हं(G) य(L) दे(G) त(L) च्च(G) — ८ पाद ४: यो(G) व(L) शि(L) ष्ये(G) त(L) सो(G) स्म्य(G) हम्(G) — ८
१२. अलङ्कारः
अन्वय अलङ्कारः: “अहमेव… सोऽस्म्यहम्” — यहाँ भगवान् की तुलना स्वयं भगवान् से ही की गई है, जो उनकी अद्वितीयता को दर्शाता है।
१३. रसः
शान्त-रसः: यह श्लोक तत्त्वज्ञान का प्रतिपादक है, अतः यहाँ निर्वेद स्थायी भाव से युक्त शान्त रस है।
१४. स्रोत-सन्दर्भः (Source Authentication)
प्रमाणितम् — श्रीमद्भागवतपुराणम् · द्वितीयस्कन्धः · नवमोऽध्यायः · श्लोकः ३३ (२.९.३३)। (चतुःश्लोकी भागवत का प्रथम श्लोक)।
१५. दोष-परीक्षा (Error Audit)
कोऽपि दोषः न दृश्यते — सर्वं शुद्धम्। पाणिनीय-व्याकरणानुसारं छन्दोऽनुसारं च श्लोकः पूर्णतः शुद्धः अस्ति।
Generated by शाब्दबोधः · https://www.shaabdabodha.app
श्लोक-विश्लेषणम् — शाब्दबोधः
श्रीमद्भागवतपुराणस्य ‘चतुःश्लोकी-भागवते’ अयं तृतीयः श्लोकः अस्ति। अत्र भगवान् स्वकीयमायायाः लक्षणं स्वरूपं च स्पष्टीकरोति।
१. पदच्छेदः (Padaccheda)
ऋते | अर्थम् | यत् | प्रतीयेत | न | प्रतीयेत | च | आत्मनि | तत् | विद्यात् | आत्मनः | मायाम् | यथा | आभासः | यथा | तमः ||
२. सन्धि-विग्रहः
| सन्धि-पदम् | पूर्वपदम् | उत्तरपदम् | सन्धि-प्रकारः | सूत्रम् | वृत्तिः |
|---|---|---|---|---|---|
| ऋतेऽर्थम् | ऋते | अर्थम् | पूर्वरूप-सन्धिः | ६.१.१०९ एङः पदान्तादति | पदान्तात् एङः अति परे पूर्वरूपमेकादेशः स्यात्। |
| यथाभासः | यथा | आभासः | सवर्णदीर्घ-सन्धिः | ६.१.१०१ अकः सवर्णे दीर्घः | अक्-वर्णात् सवर्णे अचि परे दीर्घः एकादेशः स्यात्। |
| यत्प्रतीयेत | यत् | प्रतीयेत | संयोगः | - | हलन्त्यस्य व्यञ्जनेन मेलनम्। |
३. समास-विग्रहः
अस्मिन् श्लोके साक्षात् समस्तपदानि (Compounds) न सन्ति, प्रायः सर्वाणि पदानि व्यस्तानि एव। ‘मन्मायाम्’ इति चेत् स्यात् तर्हि समासः भवेत्, किन्तु अत्र ‘आत्मनः मायाम्’ इति विग्रहवाक्यरूपेणैव प्रयुक्तम्।
४. शब्दरूप-विश्लेषणम्
| पदम् | प्रातिपदिकम् | अर्थः (English) | लिङ्गम् | विभक्तिः | वचनम् | कारकम् | सूत्रम् | वृत्तिः |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अर्थम् | अर्थ | Reality / Object | पुंल्लिङ्गम् | द्वितीया | एकवचनम् | कर्म | २.३.२ कर्मणि द्वितीया | ’ऋते’ योगे द्वितीया (वार्त्तिकम्)। |
| आत्मनि | आत्मन् | In the Self / Me | पुंल्लिङ्गम् | सप्तमी | एकवचनम् | अधिकरणम् | २.३.३६ सप्तम्यधिकरणे च | आधारोऽधिकरणम्। |
| तत् | तद् | That | नपुंसकम् | द्वितीया | एकवचनम् | कर्म | - | - |
| आत्मनः | आत्मन् | Of the Self | पुंल्लिङ्गम् | षष्ठी | एकवचनम् | सम्बन्धः | २.३.५० षष्ठी शेषे | स्व-स्वामि-सम्बन्धः। |
| मायाम् | माया | Illusory energy | स्त्रीलिङ्गम् | द्वितीया | एकवचनम् | कर्म | २.३.२ कर्मणि द्वितीया | - |
| आभासः | आभास | Reflection | पुंल्लिङ्गम् | प्रथमा | एकवचनम् | कर्ता | २.३.४६ प्रातिपदिकार्थ… | - |
| तमः | तमस् | Darkness / Shadow | नपुंसकम् | प्रथमा | एकवचनम् | कर्ता | २.३.४६ प्रातिपदिकार्थ… | - |
५. धातुरूप-विश्लेषणम्
| क्रियापदम् | मूलधातुः | गणः | अर्थः (संस्कृते) | अर्थः (English) | लकारः | पुरुषः | वचनम् | पदम् | प्रक्रिया | सूत्रम् | वृत्तिः |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प्रतीयेत | प्रति + इ | अदादि | गत्यर्थक (बोधे) | Appears | विधिलिङ् | प्रथमः | एकवचनम् | आत्मनेपदम् | इ + यक् | ३.१.६७ सार्वधातुके यक् | कर्मकर्तरि प्रयोगः। |
| विद्यात् | विद् | अदादि | ज्ञाने | Should know | विधिलिङ् | प्रथमः | एकवचनम् | परस्मैपदम् | विद् + यासुट् | ३.३.१६१ विधिनिमन्त्रण… | विधि-अर्थे लिङ्। |
६. कृदन्त-तद्धित-विश्लेषणम्
| पदम् | प्रकृतिः | प्रत्ययः | प्रत्यय-प्रकारः | अर्थः (संस्कृते) | अर्थः (English) | सूत्रम् | वृत्तिः |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| आभासः | आ + भास् | घञ् | कृत् | ईषत् भासनम् | Reflection | ३.३.१८ भावघञ् | भावे घञ् प्रत्ययः। |
| मायाम् | मा | यप् + टाप् | कृत् | मीयते अनया | Illusion | - | - |
७. अव्यय-परिचयः
१. ऋते — (वर्जने) — बिना (Without)। २. न — (निषेधे) — नहीं (Not)। ३. च — (समुच्चये) — और (And)। ४. यथा — (उपमावाचकम्) — जैसे (Just as)।
८. कारक-विभक्ति-सम्बन्धः
| पदम् | विभक्तिः | कारकम् | कारक-सूत्रम् | विभक्ति-सूत्रम् | सम्बन्धि-क्रियापदम् |
|---|---|---|---|---|---|
| अर्थम् | द्वितीया | कर्म | - | ऋते द्वितीया च (वार्त्तिकम्) | प्रतीयेत |
| आत्मनि | सप्तमी | अधिकरणम् | १.४.४५ आधारोऽधिकरणम् | २.३.३६ सप्तम्यधिकरणे च | प्रतीयेत |
| मायाम् | द्वितीया | कर्म | १.४.४९ कर्तुरीप्सिततमं कर्म | २.३.२ कर्मणि द्वितीया | विद्यात् |
९. अन्वयः (Prose Reordering)
अर्थं ऋते यत् प्रतीयेत, आत्मनि च यत् न प्रतीयेत, तत् आत्मनः मायां विद्यात्; यथा आभासः यथा तमः (च)।
१०. श्लोकार्थः
(क) प्रतिपदार्थः — अर्थम् (वास्तविक वस्तु/परमात्मा को) ऋते (बिना) यत् (जो कुछ) प्रतीयेत (प्रतीत होता है), च (और) आत्मनि (मुझ परमात्मा में) यत् (जो) न प्रतीयेत (प्रतीत नहीं होता है), तत् (उसे) आत्मनः (मेरी) मायाम् (माया) विद्यात् (समझना चाहिए); यथा (जैसे) आभासः (प्रतिबिम्ब) यथा (और जैसे) तमः (अन्धकार/राहु)।
(ख) भावार्थः (Professional Sanskrit Prose) — अत्र भगवान् मायायाः द्विविधं स्वरूपं वर्णयति — ‘आवरणशक्तिः’ तथा ‘विक्षेपशक्तिः’ इति। माया सा अस्ति या वास्तविकी नास्ति किन्तु सत्यवत् भासते (यथा आभासः — दर्पणस्थितं मुखं सत्यं नास्ति किन्तु दृश्यते)। अपरपक्षे, माया सा अस्ति या विद्यमानमपि वस्तु आच्छादयति (यथा तमः — अन्धकारः पुरतः स्थितं वस्तु न दर्शयति, अथवा राहुः सूर्यमण्डले स्थितोऽपि चक्षुषा न गृह्यते)। अतः यत् परमात्मानं विना स्वतन्त्रतया भासते तत् ‘विक्षेपः’, यच्च परमात्मनि विद्यमानमपि न दृश्यते तत् ‘आवरणम्’। एतदेव भगवतः माया-तत्त्वम्।
(ग) हिन्दी अर्थ — जो वास्तविक वस्तु (मुझ परमात्मा) के बिना प्रतीत होता है (जैसे स्वप्न या प्रतिबिम्ब) और जो मुझमें होने पर भी प्रतीत नहीं होता (जैसे अन्धकार या राहु), उसे मेरी माया समझना चाहिए।
(घ) English meaning — That which appears to exist without the Reality (Me) and that which does not appear within the Reality (Me), know that to be My illusory energy (Māyā), just like a reflection or darkness.
११. छन्दः (Metre)
छन्दस्-नाम: अनुष्टुप् अक्षर-गणना: ३२ अक्षराणि। लक्षणम्: “पञ्चमं लघु सर्वत्र सप्तमं द्विचतुर्थयोः। गुरु षष्ठं च पादानां शेषेष्वनियमो मतः॥“
१२. अलङ्कारः
उपमा अलङ्कारः: यहाँ माया को समझाने के लिए ‘आभास’ (प्रतिबिम्ब) और ‘तमः’ (अन्धकार/राहु) के दो उदाहरण दिए गए हैं, अतः यहाँ पूर्णोपमा है।
१३. रसः
शान्त-रसः: माया के स्वरूप का विवेचन होने के कारण यहाँ तत्त्वज्ञान-प्रधान शान्त रस है।
१४. स्रोत-सन्दर्भः (Source Authentication)
प्रमाणितम् — श्रीमद्भागवतपुराणम् · द्वितीयस्कन्धः · नवमोऽध्यायः · श्लोकः ३४ (२.९.३४)। (चतुःश्लोकी भागवत का तृतीय श्लोक)।
१५. दोष-परीक्षा (Error Audit)
कोऽपि दोषः न दृश्यते — सर्वं शुद्धम्। व्याकरण-छन्द-अन्वय-दृष्ट्या श्लोकः निर्दोषः अस्ति।
Generated by शाब्दबोधः · https://www.shaabdabodha.app
श्लोक-विश्लेषणम् — शाब्दबोधः
श्रीमद्भागवतपुराणस्य ‘चतुःश्लोकी-भागवते’ अयं चतुर्थः अन्तिमश्च श्लोकः अस्ति। अत्र भगवान् स्वस्य विश्वरूपतां विश्वविलक्षणतां च ‘अन्वय-व्यतिरेक’ दृष्ट्या स्पष्टीकरोति।
१. पदच्छेदः (Padaccheda)
यथा | महान्ति | भूतानि | भूतेषु | उच्चावचेषु | अनु | प्रविष्टानि | अप्रविष्टानि | तथा | तेषु | न | तेषु | अहम् ||
२. सन्धि-विग्रहः
| सन्धि-पदम् | पूर्वपदम् | उत्तरपदम् | सन्धि-प्रकारः | सूत्रम् | वृत्तिः |
|---|---|---|---|---|---|
| भूतेषूच्चावचेष्वनु | भूतेषु + उच्चावचेषु + अनु | - | सवर्णदीर्घः, यण्-सन्धिः | ६.१.१०१, ६.१.७७ | उ + उ = ऊ; उ + अ = व। |
| प्रविष्टान्यप्रविष्टानि | प्रविष्टानि | अप्रविष्टानि | यण्-सन्धिः | ६.१.७७ इको यणचि | इकारस्य स्थाने यकारः। |
| तेष्वहम् | तेषु | अहम् | यण्-सन्धिः | ६.१.७७ इको यणचि | उकारस्य स्थाने वकारः। |
३. समास-विग्रहः
| समासपदम् | विग्रहवाक्यम् | समास-प्रकारः | उपपदानि | सूत्रम् | वृत्तिः |
|---|---|---|---|---|---|
| उच्चावचेषु | उच्चानि च अवचानि च, तेषु | द्वन्द्व-समासः | उच्च, अवच | २.२.२९ चार्थे द्वन्द्वः | उभयपदार्थप्रधानः। |
| अप्रविष्टानि | न प्रविष्टानि | नञ्-तत्पुरुषः | न, प्रविष्ट | २.२.६ नञ् | निषेधार्थे नञ्-समासः। |
| महान्ति भूतानि | महान्ति च तानि भूतानि च | कर्मधारयः | महत्, भूत | २.१.५७ विशेषणम्… | विशेषण-विशेष्य भावः। |
४. शब्दरूप-विश्लेषणम्
| पदम् | प्रातिपदिकम् | अर्थः (English) | लिङ्गम् | विभक्तिः | वचनम् | कारकम् | सूत्रम् | वृत्तिः |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| महान्ति | महत् | Great | नपुंसकम् | प्रथमा | बहुवचनम् | विशेषणम् | - | - |
| भूतानि | भूत | Elements | नपुंसकम् | प्रथमा | बहुवचनम् | कर्ता | २.३.४६ | - |
| भूतेषु | भूत | In the beings | नपुंसकम् | सप्तमी | बहुवचनम् | अधिकरणम् | २.३.३६ | आधारोऽधिकरणम्। |
| उच्चावचेषु | उच्चावच | In high and low | नपुंसकम् | सप्तमी | बहुवचनम् | विशेषणम् | - | - |
| तेषु | तद् | In them | नपुंसकम् | सप्तमी | बहुवचनम् | अधिकरणम् | - | - |
| अहम् | अस्मद् | I | पुंल्लिङ्गम् | प्रथमा | एकवचनम् | कर्ता | २.३.४६ | - |
५. धातुरूप-विश्लेषणम्
अस्मिन् श्लोके साक्षात् क्रियापदं नास्ति, ‘सन्ति’ तथा ‘अस्मि’ इति क्रियापदे अध्याहृते (implied) स्तः।
| क्रियापदम् | मूलधातुः | गणः | अर्थः (संस्कृते) | अर्थः (English) | लकारः | पुरुषः | वचनम् | पदम् |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| (अस्मि) | अस् | अदादि | सत्तायाम् | Am | लट् | उत्तमः | एकवचनम् | परस्मैपदम् |
६. कृदन्त-तद्धित-विश्लेषणम्
| पदम् | प्रकृतिः | प्रत्ययः | प्रत्यय-प्रकारः | अर्थः (संस्कृते) | अर्थः (English) | सूत्रम् | वृत्तिः |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प्रविष्टानि | प्र + विश् | क्त | कृत् | प्रविष्टानि | Entered | ३.२.१०२ निष्ठा | भूतकाले क्त। |
| भूतानि | भू | क्त | कृत् | उत्पन्नानि | Elements/Beings | ३.२.१०२ निष्ठा | - |
७. अव्यय-परिचयः
१. यथा — उपमावाचकम् (Just as)। २. अनु — पश्चादर्थे / लक्षणे (Following / After)। ३. तथा — उपमावाचकम् (In the same way)। ४. न — निषेधार्थकम् (Not)।
८. कारक-विभक्ति-सम्बन्धः
| पदम् | विभक्तिः | कारकम् | कारक-सूत्रम् | विभक्ति-सूत्रम् | सम्बन्धि-क्रियापदम् |
|---|---|---|---|---|---|
| भूतानि | प्रथमा | कर्ता | १.४.५४ | २.३.४६ | (सन्ति) |
| भूतेषु | सप्तमी | अधिकरणम् | १.४.४५ | २.३.३६ | प्रविष्टानि |
| अहम् | प्रथमा | कर्ता | १.४.५४ | २.३.४६ | (अस्मि) |
९. अन्वयः (Prose Reordering)
यथा महान्ति भूतानि उच्चावचेषु भूतेषु अनु प्रविष्टानि (सन्ति), (किन्तु स्वरूपतः तानि) अप्रविष्टानि (अपि सन्ति), तथा अहम् तेषु (भूतेषु प्रविष्टः अस्मि), (किन्तु) तेषु न (अस्मि)।
१०. श्लोकार्थः
(क) प्रतिपदार्थः — यथा (जैसे) महान्ति भूतानि (पंचमहाभूत) उच्चावचेषु (छोटे-बड़े) भूतेषु (प्राणियों/पदार्थों में) अनु प्रविष्टानि (प्रविष्ट हुए हैं), (किन्तु) अप्रविष्टानि (प्रविष्ट नहीं भी हैं), तथा (वैसे ही) अहम् (मैं) तेषु (उनमें) प्रविष्टः (प्रविष्ट हूँ), (किन्तु) तेषु न (उनमें नहीं भी हूँ)।
(ख) भावार्थः (Professional Sanskrit Prose) — अत्र भगवान् ‘अन्वय-व्यतिरेक’ सिद्धान्तं निरूपयति। यथा पृथिव्यादीनि पञ्चमहाभूतानि घट-पटादि-पदार्थेषु कारणरूपेण प्रविष्टानि वर्तन्ते (अन्वयः), किन्तु तानि पदार्थेभ्यः पृथक् अपि स्वतन्त्रतया विद्यन्ते (व्यतिरेकः), तथैव परमात्मा सर्वेषु भूतेषु अन्तर्यामिरूपेण प्रविष्टः अस्ति। तथापि सः प्रपञ्चातीतत्वात् तेषु न प्रविष्टः इव असङ्गः तिष्ठति। अयं भावः यत् भगवान् सर्वव्यापी भूत्वापि निर्लेपः अस्ति। सः जगति अस्ति, किन्तु जगत् तस्मिन् नास्ति (अर्थात् सः जगदाश्रितः नास्ति)।
(ग) हिन्दी अर्थ — जैसे पंचमहाभूत (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) संसार के छोटे-बड़े सभी पदार्थों में प्रविष्ट होते हुए भी उनसे अलग (अप्रविष्ट) रहते हैं, वैसे ही मैं इन सबमें व्यापक होते हुए भी इनसे सर्वथा परे और असंग हूँ।
(घ) English meaning — Just as the great elements enter into all beings, high and low, and yet remain outside them (as they exist independently), similarly, I exist within everything created and yet I am outside of everything.
११. छन्दः (Metre)
छन्दस्-नाम: अनुष्टुप् अक्षर-गणना: ३२ अक्षराणि (८ प्रति पाद)। लक्षणम्: “श्लोके षष्ठं गुरु ज्ञेयं सर्वत्र लघु पञ्चमम्। द्विचतुष्पादयोर्ह्रस्वं सप्तमं दीर्घमन्ययोः॥“
१२. अलङ्कारः
दृष्टान्त अलङ्कारः: महाभूतों के उदाहरण के माध्यम से ईश्वर की सर्वव्यापकता और असंगता का बिम्ब-प्रतिबिम्ब भाव से वर्णन किया गया है।
१३. रसः
शान्त-रसः: अत्र तत्त्वज्ञानस्य पराकाष्ठा वर्तते, अतः शान्त रसः।
१४. स्रोत-सन्दर्भः (Source Authentication)
प्रमाणितम् — श्रीमद्भागवतपुराणम् · द्वितीयस्कन्धः · नवमोऽध्यायः · श्लोकः ३५ (२.९.३५)। (चतुःश्लोकी भागवत का अन्तिम श्लोक)।
१५. दोष-परीक्षा (Error Audit)
कोऽपि दोषः न दृश्यते — सर्वं शुद्धम्। व्याकरण-छन्द-अन्वय-दृष्ट्या श्लोकः निर्दोषः अस्ति। 🌸
Generated by शाब्दबोधः · https://www.shaabdabodha.app