तिब्बत और भारतीय सिद्धों का संबंध इतिहास का एक अत्यंत गौरवशाली और महत्वपूर्ण अध्याय है। 8वीं से 12वीं शताब्दी के बीच, भारत के ‘चौरासी महासिद्धों’ (84 Mahasiddhas) में से कई महान संत, तांत्रिक और विद्वान बौद्ध धर्म (विशेषकर वज्रयान), तंत्र शास्त्र और योग विद्या का प्रचार करने तिब्बत गए।
तिब्बती परंपरा में इन सिद्धों को बहुत ऊँचा स्थान प्राप्त है। इन्होंने न केवल वहाँ भारतीय ज्ञान का बीजारोपण किया, बल्कि तिब्बती भाषा, लिपि और स्थानीय संस्कृति को भी एक नया आकार दिया। तिब्बत का वज्रयान बौद्ध धर्म आज भी मूल रूप से इन्हीं भारतीय सिद्धों की शिक्षाओं पर आधारित है।
तिब्बती लिपि और ‘महान अनुवाद अभियान’ (The Great Translation Project)
भारतीय ज्ञान को तिब्बत में स्थापित करने की शुरुआत 7वीं शताब्दी में ही हो गई थी, जब तिब्बत के राजा सोंगत्सेन गम्पो ने अपने मंत्री थोनमी सम्भोटा (Thonmi Sambhota) को भारत भेजा था। थोनमी ने भारतीय ब्राह्मी और देवनागरी लिपियों के आधार पर ही ‘तिब्बती लिपि’ का निर्माण किया। इसके बाद सदियों तक संस्कृत के अमूल्य ग्रंथों का बड़े पैमाने पर तिब्बती में अनुवाद हुआ, जिन्हें आज ‘कंजुर’ (बुद्ध के वचन) और ‘तंजुर’ (टीकाएँ) के नाम से जाना जाता है।
तिब्बत जाने वाले प्रमुख सिद्ध और आचार्य
1. गुरु पद्मसंभव (गुरु रिनपोछे)
तिब्बत में बौद्ध धर्म और तंत्र के वास्तविक संस्थापक गुरु पद्मसंभव ही थे। वे नालंदा के प्रसिद्ध विद्वान थे और उन्हें एक परम सिद्ध तांत्रिक माना जाता था। 8वीं शताब्दी में तिब्बत के राजा ठिसोंग देत्सेन ने उन्हें आमंत्रण भेजा था। माना जाता है कि उन्होंने अपनी तांत्रिक शक्तियों से तिब्बत की स्थानीय बाधाओं और ‘बोन’ (Bon) धर्म की नकारात्मक ऊर्जाओं को शांत कर उन्हें धर्मरक्षक बनाया। उन्होंने वहाँ ‘न्यिंग्मा’ (Nyingma) संप्रदाय की नींव रखी। तिब्बती लोग उन्हें अत्यंत श्रद्धा से ‘दूसरा बुद्ध’ मानते हैं।
2. आचार्य शांतरक्षित
ये नालंदा विश्वविद्यालय के अत्यंत प्रतिष्ठित विद्वान और उच्च कोटि के आचार्य थे। गुरु पद्मसंभव से पहले राजा ठिसोंग देत्सेन के बुलावे पर शांतरक्षित तिब्बत पहुंचे थे। उन्होंने तिब्बत के पहले बौद्ध मठ ‘साम्ये’ (Samye) की स्थापना की, भिक्षुओं के लिए विनय (नियम) लागू किए और दार्शनिक तर्कशास्त्र की शुरुआत की। बाद में जब वैचारिक विरोध हुआ, तो उन्होंने ही राजा को गुरु पद्मसंभव को भारत से बुलाने की सलाह दी थी।
3. दीपंकर श्रीज्ञान (अतीश दीपंकर)
11वीं शताब्दी के महानतम सिद्धों और आचार्यों में से एक, जो विक्रमशिला विश्वविद्यालय के प्रमुख थे। 1042 ईस्वी में वे तिब्बत के राजा के विशेष आग्रह पर वहां गए। उस समय उनकी आयु काफी अधिक थी, फिर भी वे दुर्गम रास्तों से होते हुए तिब्बत पहुँचे। उन्होंने तिब्बत में बिखर चुके बौद्ध धर्म और तंत्र को पुनः शुद्ध और व्यवस्थित किया। उन्होंने मठवासी अनुशासन और तांत्रिक साधनाओं का समन्वय कर ‘कादम’ (Kadampa) संप्रदाय की नींव रखी, जो बाद में ‘गेलुग’ (दलाई लामा का संप्रदाय) का आधार बना।
4. आचार्य कमलाशील
ये आचार्य शांतरक्षित के प्रमुख शिष्य थे। तिब्बत में जब चीनी बौद्ध भिक्षुओं (जो केवल ध्यान और शून्यता पर बल देते थे) और भारतीय बौद्ध विद्वानों (जो क्रमिक मार्ग और आचार-विचार पर बल देते थे) के बीच वैचारिक मतभेद बढ़ा, तो साम्ये मठ में एक ऐतिहासिक शास्त्रार्थ (Council of Lhasa) हुआ। कमलाशील ने अपनी तार्किक प्रतिभा से चीनी भिक्षु ‘ह्वाशंग’ को परास्त कर तिब्बत में भारतीय बौद्ध दर्शन (माध्यमिक दर्शन) की श्रेष्ठता हमेशा के लिए स्थापित की।
84 महासिद्धों का प्रभाव और वज्रयान का विकास
भारतीय सिद्धों की परंपरा (जैसे सरहपा, शबरपा, लुइपा, विरूपा, डोम्भीपा, तिलोपा और नरोपा) मुख्य रूप से मठों के बाहर रहने वाले साधकों की थी। इनमें से कई जुलाहे, लोहार और साधारण पृष्ठभूमि से आते थे जिन्होंने तंत्र और योग के माध्यम से सीधे ज्ञान प्राप्त किया था।
हालाँकि ये सभी 84 महासिद्ध सीधे तिब्बत नहीं गए, लेकिन उनके शिष्यों और ग्रंथों ने तिब्बत के प्रमुख संप्रदायों को जन्म दिया:
- काग्यू (Kagyu) संप्रदाय: भारत के महान सिद्ध तिलोपा और नरोपा की योग पद्धतियों (जैसे नरोपा के छह योग) को तिब्बत के महान अनुवादक ‘मार्पा’ भारत आकर सीख गए। मार्पा ने इन शिक्षाओं को अपने शिष्य ‘मिलारेपा’ (तिब्बत के सबसे प्रसिद्ध योगी-कवि) को दिया।
- साक्या (Sakya) संप्रदाय: यह संप्रदाय भारतीय महासिद्ध ‘विरूपा’ की शिक्षाओं से गहराई से प्रभावित है।
नालंदा परंपरा और ज्ञान का संरक्षण
जब 12वीं-13वीं शताब्दी में विदेशी आक्रमणों के कारण भारत में नालंदा और विक्रमशिला जैसे महान विश्वविद्यालय नष्ट हो गए, तब भारतीय सिद्धों के लिखे ‘चर्यापद’, ‘दोहाकोश’ और गुप्त तांत्रिक ग्रंथ केवल तिब्बती अनुवादों के रूप में ही सुरक्षित बच पाए।
भारतीय सिद्धों के तिब्बत जाने का सबसे बड़ा ऐतिहासिक लाभ यह हुआ कि जो ज्ञान परंपरा भारत में लुप्त हो गई थी, वह तिब्बत के हिमालयी मठों में सदियों तक सुरक्षित रही। वर्तमान समय में परम पावन दलाई लामा तिब्बती बौद्ध धर्म को “नालंदा परंपरा” (The Nalanda Tradition) कहकर ही संबोधित करते हैं, जो भारतीय आचार्यों और सिद्धों के प्रति उनके गहरे सम्मान को दर्शाता है।