This image contains the Mahabodhivandanaṣṭakam (महाबोधिवन्दनाष्टकम्), an eight-verse hymn of salutation to the Buddha (the Great Awakened One). Below is the Devanagari transcription followed by a Hindi translation based on the Sanskrit terminology.

महाबोधिवन्दनाष्टकम्

सौवर्णवर्णं कलविङ्कघोषं ब्रह्मस्वरं कारुणिकं सुसेव्यम् ।
नरोत्तमं शीलविशुद्धदेहं श्रीमन्महाबोधिमहं नमामि ॥ १ ॥
 
शक्येन्द्रवंशोद्भवदिव्यदेहं तृष्णाच्छिदं मारभिदं जिनेशम् ।
ज्ञानास्पदं क्लेशभिदं दिनेशं श्रीमन्महाबोधिमहं नमामि ॥ २ ॥
 
समन्तभद्रं वरलक्षणाङ्गं सत्त्वार्थसिद्धिं सुकृतैः प्रणम्यम् ।
श्रेयस्करं सत्त्वहितैकचित्तं श्रीमन्महाबोधिमहं नमामि ॥ ३ ॥
 
धर्मोदकं यः कृपयोत्ससर्ज रागाग्निसन्दीपितपुद्गलानाम् ।
सुखाय संबोधिपयोमुचं तं श्रीमन्महाबोधिमहं नमामि ॥ ४ ॥
 
भवाब्धिनिस्तारणसेतुभूतं तथागतं तत्त्वविदं नृसिंहम् ।
त्रैलोक्यनाथं वरबोधिरत्नं श्रीमन्महाबोधिमहं नमामि ॥ ५ ॥
 
पदार्थसम्पादनसुव्रतस्थं मायासुतं मारभिदं जितारिम् ।
शास्तारमग्र्यं वरबोधिसत्त्वं श्रीमन्महाबोधिमहं नमामि ॥ ६ ॥
 
लोकेशनाथं हरिनाथानाथं भूतेशनाथं सुरनाथनाथम् ।
कृतान्तनाथं नरनाथनाथं श्रीमन्महाबोधिमहं नमामि ॥ ७ ॥
 
स बुद्धरूपः स हि धर्मरूपः स एव संघोऽपि विनेयकानाम् ।
अभूच्छरण्यः शरणागतानां श्रीमन्महाबोधिमहं नमामि ॥ ८ ॥
**श्रीमन्महाबोधिवन्दनाष्टकं समाप्तम् ।**

हिन्दी अनुवाद (शब्दार्थ सहित)

ॐ बुद्ध को नमस्कार है।

  1. स्वर्ण के समान आभा वाले, कोयल जैसी मधुर वाणी वाले, ब्रह्मा के समान गंभीर स्वर वाले, करुणा से भरे और सेवा के योग्य; मनुष्यों में उत्तम और शील से पवित्र शरीर वाले, उन श्रीमन् महाबोधि (बुद्ध) को मैं प्रणाम करता हूँ।
  2. शाक्यवंश के इंद्र (राजा) के कुल में उत्पन्न दिव्य शरीर वाले, तृष्णा (इच्छाओं) को काटने वाले, मार (मोह-माया) का भेदन करने वाले और जितेन्द्रिय; ज्ञान के आधार, क्लेशों का नाश करने वाले और सूर्य के समान तेजस्वी, उन श्रीमन् महाबोधि को मैं प्रणाम करता हूँ।
  3. सब ओर से कल्याणकारी, श्रेष्ठ लक्षणों वाले अंगों से युक्त, प्राणियों के अर्थ की सिद्धि करने वाले और पुण्यों द्वारा प्रणाम करने योग्य; कल्याण करने वाले और प्राणियों के हित में ही चित्त लगाने वाले, उन श्रीमन् महाबोधि को मैं प्रणाम करता हूँ।
  4. जिन्होंने रागाग्नि (विषय-वासना की अग्नि) से जलते हुए मनुष्यों के लिए करुणावश धर्म रूपी जल की वर्षा की; सुख के लिए ज्ञान रूपी बादल के समान उन श्रीमन् महाबोधि को मैं प्रणाम करता हूँ।
  5. संसार रूपी समुद्र से पार उतारने के लिए सेतु (पुल) के समान, तथागत (सत्य को प्राप्त), तत्त्वज्ञानी और पुरुषों में सिंह के समान श्रेष्ठ; तीनों लोकों के स्वामी और श्रेष्ठ बोधि-रत्न स्वरूप, उन श्रीमन् महाबोधि को मैं प्रणाम करता हूँ।
  6. मोक्ष रूपी परम पद के संपादन के व्रत में स्थित, मायादेवी के पुत्र, मार (कामदेव/मोह) को जीतने वाले और शत्रुओं (विकारों) पर विजय पाने वाले; सर्वश्रेष्ठ शास्ता (गुरु) और श्रेष्ठ बोधिसत्व स्वरूप, उन श्रीमन् महाबोधि को मैं प्रणाम करता हूँ।
  7. जो लोकों के स्वामी, इंद्र के स्वामी, भूतों (प्राणियों) के स्वामी, देवताओं के स्वामी, मृत्यु (यम) के भी स्वामी और मनुष्यों के नायकों के भी नायक हैं; उन (सर्वोच्च) श्रीमन् महाबोधि को मैं प्रणाम करता हूँ।
  8. जो साक्षात् बुद्ध रूप हैं, वही धर्म रूप हैं, और वही शिष्यों के लिए संघ रूप भी हैं; जो शरणागतों के लिए एकमात्र शरण (आश्रय) हुए, उन श्रीमन् महाबोधि को मैं प्रणाम करता हूँ। श्रीमन् महाबोधि वन्दनाष्टक समाप्त हुआ।