रामकृष्ण मठ के लिये कुछ महत्वपूर्ण सुझाव

🤔 रामकृष्ण मठ,मिशन एवं समस्त संघ के बेहतरी के लिए विनम्र सूचनाएं:-

🤔 रामकृष्ण-विवेकानंद साहित्य के प्रचार-प्रसार हेतू, उनको भारत के घर-घर तक पहुँचाने हेतू महत्वपूर्ण सूचनाएं:-

मैंने डेढ़ साल स्वामी विवेकानंद और रामकृष्ण परमहंस का साहित्य झोले में रखकर साइकिल पर घर-घर, विद्यार्थियों के हॉस्टल्स, स्कूल्स, कॉलेजेस में बेचने का काम किया है। जिन विद्यार्थियों के रूम में मुझे प्रवेश मिलता वहाँ मैं पुस्तकें बेचने के साथ-साथ दस मिनट के ध्यानसाधना का ताबड़तोड़ सत्र भी लिया करता था। इस प्रकार कईं विद्यार्थियों को मैंने ध्यानसाधना सिखाई है। यह बात 2016-17 की है। यह मेरे कर्मयोग का एक अंग था।

सुबह मैं ब्रह्म मुहूर्त में उठकर ध्यान योग का अभ्यास करता, उसके बाद हठयोग का, तदूपरांत कर्मयोग के लिए किताबें लेकर बेचने निकल पड़ता; दोपहर में लौटता, भोजन पका कर खाता, थोड़ी देर आराम करता, और फिर संध्या समय में निकल पड़ता। संध्या समय लौटने के बाद थोड़ा समय ध्यान, और भक्ति योग में बीतता और भोजन पश्चात ज्ञान योग के अनुसार आत्म चिंतन करके सो जाता।

यह साहित्य बेचते हुए मुझे कुछ ऐसी सुधार की बातें समझ में आयी जो कर लेने पर रामकृष्ण मठ-मिशन का कार्य और अधिक आसान हो जाएगा। इन सुचनाओं के कार्यान्वयन से जो दिव्य एवं देव कार्य रामकृष्ण मठ-मिशन कर रहे है, वह और अधिक सुलभ (facilitate) हो जायेगा। रामकृष्ण संघ बहुत बढ़िया आध्यात्मिक संगठन है और इन्होंने जो ईश्वरी कार्य किया है उसके लिए वे सदा धन्यवाद के पात्र है। उसी के चलते विनम्रता से मैं नीचे कुछ सुचनाएँ रख रहा हूँ। आशा करता हूँ कि इन पर सोच-विचार होकर इनको धरातल पर लाया जायेगा, सकारात्मक बदलाव किए जायेंगे।

  1. संगीति की आवश्यकता:- इतिहास में बौद्धों की संगीतियां सुप्रसिद्ध है। इन संगीतियों में ही बौद्ध धम्मचक्रप्रवर्तन का संकल्प किया गया जिसने बौद्ध संघ में एक क्रियाशीलता लाकर रख दी, योजनाबद्ध तरीके से काम हुआ, और इस तरह दूर-दूर तक बौध्द धर्म का फैलाव हुआ। तब तो आवाजाही के साधन भी उपलब्ध नहीं थे फिर भी इच्छा शक्ति के बल पर उन्होंने इतना बड़ा कार्य खड़ा कर दिया। क्या कारण है कि रामकृष्ण-विवेकानंद के सवासौ साल बाद भी भारत के गांव तो छोड़ दीजिए, तहसील भी छोड़ दीजिए, जिलों के प्रमुख शहरों में भी घर-घर हम विवेकानंद की पुस्तक नहीं पहुंचा पाए? इसमें तो कोई दो राय नहीं होनी चाहिए कि रामकृष्ण संघ की real strength रामकृष्ण एवं विवेकानंद का साहित्य ही है। इसी तर्ज पर दुनिया भर में साहित्य प्रचार-प्रसार के लिए रामकृष्ण मठ-मिशन सभी सन्यासी एवं सभी हितचिंतकों की संगीति (विचार विनिमयार्थ विश्वव्यापी बैठक) होनी चाहिए। यह रामकृष्ण संघ की संगीति केवल और केवल रामकृष्ण-विवेकानंद का साहित्य को दुनियाभर में फैलाने हेतु होनी चाहिए, जिसमें इस कार्य हेतु 500 करोड़ रुपए डोनेशन जमा करने का संकल्प होना चाहिए। पहले दान इस लेख का लेखक देने को तैयार है। मेरे जैसा बेघर और दरिद्री आदमी अगर ₹- 11000/- और सक्रिय सहभाग दे सकता है तो रामकृष्ण संघ के तो सुना है डेढ़ हजार सन्यासी है और हजारों की संख्या में करोड़पति,अरबपति, उद्योगपति, राजनेताओं का शिष्य संप्रदाय है। मेरी यह दृढ़ मान्यता है कि भारत एवं हिंदू धर्म का उत्थान कहो या कल्याण, रामकृष्ण-विवेकानंद के साहित्य को पढ़कर और उसके अनुसार साधना करके ही संभव है। जिनकी चेतना बुद्धि में स्थित होती है देश के ऐसे लगभग 20 से 30% युवा लोगों को इस पहल का प्रत्यक्ष फायदा होना निश्चित है। यह कार्यान्वयन कैसे करना है इसका सारा रोड मैप मेरे पास तैयार है। घर-घर हो या स्कूल, कॉलेज हो या प्राइवेट क्लासेस, मुझे इसका अनुभव है और यह कार्य करने की अगर रामकृष्ण संघ ठान ले, तो कम से कम भारत में तो सब दूर कोने-कोने में कर ही सकता है।

  2. माध्यम की आवश्यकता:- रामकृष्ण विवेकानंद की पुस्तकें अमृत है इसमें अतिशयोक्ति होते हुए भी अतिशयोक्ति नहीं है; लेकिन इसको प्यासों तक पहुंचाने का माध्यम (medium) की हमारी समस्या है; रामकृष्ण संघ की पुस्तकें छापने के लिए प्रकाशन विभाग तो है, किंतु यह पर्याप्त नहीं है। विपणन (Marketing) विभाग भी होना चाहिए जो प्रकाशन और गली-गली के लोगों के बीच का माध्यम बनेगा।

    प्रोफेशनल एकेडमिक बुक स्टॉल्स वाले दुकानदार स्वामी जी की किताबें रखते नहीं है, क्योंकि इन पुस्तकों की मांग (Demand) कम है। इसलिए शालेय दुकानदारों के माध्यम से यह पुस्तकें बेची जाएगी, यह अपेक्षा नहीं की जा सकती। अत: अन्य माध्यम या मार्ग ढूंढने होंगे। यह माध्यम का काम चार प्रकार से होते आया है;-

    i) रामकृष्ण मठों के या रेलवे स्टेशंस या अन्य कहीं लगे स्थायी Book Stalls द्वारा।

    ii) जहां-जहां सन्यासियों के प्रवचन होते हैं वहां लगाए जाने वाले Book Stalls द्वारा।

    iii) जगह-जगह घूमने वाली मठ-मिशन की गाड़ियों के माध्यम से। इन गाडियों के पास बहूत ही कम लोग खुद चलकर आते है। बाकी लोगों को पता भी नहीं होता कि ऐसी कोई विवेकानंद के किताबों वाली गाडी आकर चली गयी! बेचनेवाले नौकर को अपना पगार मिलता रहता है, चाहे पुस्तकें बेची जाय या न बेची जाय; वे उदासिन होते है। मैं उनके लिए यहां दो सूचनाओं करना चाहूंगा। पहली बात की उनके पास एक वायरलेस माइक हो जो बाजार में आजकल उपलब्ध है दिया जाए। इसमें हर बार बोलने की जरूरत नहीं होती, record करके automatically दोहराया जाता है; और दूसरी बात उनको किताबों के विक्रय पर कुछ प्रतिशत कमीशन भी दिया जाय ताकि वे ज्यादा से ज्यादा किताबें बेचने के लिए खुद प्रवृत्त हो; अन्यथा वे गाडी में बैठे रहते है।

    iv)Online internet के माध्यम से किताबें बेची जाती है। (Whats App पर प्रचार-प्रसार हेतू मैंने समग्र विवेकानंद साहित्य में समाहित सभी व्याख्यानों, कविताओं इत्यादि की Titlewise list भी बनायी है जिसके माध्यम से वाचक स्वामीजी के समग्र साहित्य का जायजा दो-तीन मिनट में ले सकते हैं।)

    और अन्य पाँच निम्नलिखित तरीके है जिन्हें ज्यादा से ज्यादा बढ़ावा देना होगा:-

    v)पांच गांव मिलकर एक विक्रेता जो विवेकानंद-प्रेमी हो उसे यह दायित्व सौंपा जाए कि वहां वहां के लोगों के घर-घर जाकर, हर हफ्ते गाँवों के बाजारों में, स्कूल या कॉलेज के बच्चों को वह किताबें बेचें; अर्थात यह उसका साइड बिजनेस होगा। हर गांव में भजनी मंडल वाले कुछ लोग ज़रूर होते हैं जिनमें से कोई यह काम अवश्य कर सकता है, विशेषत: महिलायें।

    vi)रामकृष्ण संघ के शहरी तथा दीक्षित भक्तों का एक ग्रुप बनाकर शनिवार, रविवार के दिन झोले में पुस्तकें लेकर सेवा भाव से किसी एक गांव, कस्बे, या शहर के कॉलोनी में जाकर प्रचार-प्रसार एवं विक्रय करना होगा। (इस्कॉन का प्रचार तंत्र इसी प्रकार का है जो बहुत असरदार है।) इस माध्यम से जिले के शहरों में Colonies या Societies के घर-घर जाने का काम चार-छह महीनों में हो सकता है।

    vii) माध्यमिक या उच्च माध्यमिक स्कूलों के शिक्षकों को हर एक स्कूल में एक शिक्षक को जो विवेकानंद-प्रेमी हो उसे विक्रय का दायित्व दिया जाय जिसका पैसा भी उसे मुनाफे के तौर पर मिले।

    viii) Professional Marketting of Trained youth:- कमीशन के तत्व पर कॉलेज के इच्छुक एवं जरूरतमंद युवक-युवतियों को यह पुस्तकें बेचने का दो-तीन दिन का ट्रेनिंग दिया जाए और उन्हें ग्रुप बना कर हर एक कॉलोनी, मैसेस, हॉस्टल्स, अभ्यासिकाएँ, प्राइवेट क्लासेस, रास्तों पर, गार्डन्स में, ऑफिसेस में, बस अड्डे पर इत्यादि जगह भेजा जाय। इसमें दीक्षित युवा भक्त भी हो सकते हैं। यह काम मैं बेहतर ढंग से कर चूका हूँ।

    ix)किसी कॉलेज, विश्वविद्यालय में, प्राइवेट क्लास में, कोई सन्यासी या ब्रह्मचारी जाकर हर रोज वहां के विद्यार्थियों का one to one Counseling करके उनको स्वामी जी की पुस्तकें रिकमेंड करना। इस माध्यम से संघ को जीवन समर्पित करने वाले उदयोन्मुख युवा मिलने के अवसर ज्यादा होते हैं।

  3. ‘कठिन शब्दों के अर्थ’ उसी पन्ने पर या अंत में दिए जाय। वाचन का व्यासंग पहले जैसा नहीं रहा, यह बात तो सभी लोग स्वीकारते है। इसी के साथ, युवाओं की संवंदना तथा भाषाकौशल्य प्रतिदिन कम होता जा रहा है। विवेकानंद के नाम के प्रभाव से युवा लोग पुस्तकें खरीद तो लेते है परन्तू क्लिष्ट भाषा और विशिष्ट शब्दों के अर्थ न समझ पाने से कुछ पन्ने पढ़कर पुस्तक रख देते है। मेरे देखने में आया है कि ‘अद्वैत’, ‘द्वैत’, ‘सिध्द’, ‘सिध्दी’, ‘ब्रह्म’ इन सामान्य शब्दों के अर्थ भी छोटे तो क्या बड़े लोग भी नहीं जानते। ‘समाधि’ इस शब्द का अर्थ बहूत लोग ‘मजार’ ही समझते है। ‘अच्यूत’ शब्द अश्लिलतासूचक लगता है। बहुत लोग यह भी नहीं जानते कि आदि शंकराचार्य और आजकल के शंकराचार्य अलग-अलग है। इसी कारण स्वामीजी के व्याख्यानों में जो तत्वज्ञान से संबंधित पारिभाषिक शब्द (Jargon) आते है, उनके अर्थ या तो उसी पन्ने पर या पुस्तक के अंत में Appendix बनाकर दिए जाय। उदाहरण के लिए- द्वैत, अद्वैत, विशिष्ट अद्वैत, द्वैताद्वैत, वेदान्त, उपनिषद, षडदर्शन, रामानुजाचार्य इत्यादि इत्यादि।

  4. हिंदू धर्म इस शीर्षक से स्वामी विवेकानंद के प्रवचन चुनकर एक व्यापक पुस्तक हो सकती है जिसकी बहुत ज़रूरत है। स्वामीजी की जो भी ‘हिंदू धर्म’ शीर्षक से पुस्तिका है वह बहुत छोटी और insufficient है। बहुत सारे संबंधित अन्य प्रवचन और स्फुट लेख उसमें समाहित किए जा सकते हैं। इस आकर्षक शीर्षक से यह पुस्तक बहूत लोकप्रिय है, लेकिन छोटी और अपूर्ण है। इसे व्यापक बनाना होगा।

  5. स्वामी विवेकानंद और रामकृष्ण परमहंस की जीवनी सरल, कथारूप भाषाशैली में लिखी जाय। मुजुमदार द्वारा लिखित स्वामीजी की जीवनी बहूत अधूरी तथा क्लिष्ट है जो साधारण युवाओं के लिए कठिन और अनावश्यक भी है। स्वामी निखिलानंद द्वारा लिखित जीवनी उसकी तुलना में सरल एवं संतुलित है। इसी तरह परांजपे द्वारा लिखित रामकृष्ण की जीवनी में वाक्य बड़े-बड़े आते है, और पहले अस्सी-नब्बे पन्ने तो मूल विषय से दूर ही भटकाते है, कुछ महत्वपूर्ण तथ्य छिपाये गये है। अत: रामकृष्ण और विवेकानंद के एक सरल, सुबोध, समग्र जीवनी की ज़रूरत है।

  6. प्रवचनों में हर मुद्दे को Title दिया जाए या जो पंक्तियां हैं उनको Bold Font में किया जाए:- स्वामी जी के प्रवचनों में जहां-जहां जो-जो मुद्दा आता है उनको वहां Title के रूप में दिया जाए, उदाहरण के लिए- ’ मूर्ति पूजा की वैज्ञानिकता’, ‘पुनर्जन्म होता है या नहीं?’, ‘सगुन या निर्गुण’, इत्यादि इत्यादि. (यह रामकृष्ण के ‘वचनामृत’ में किया गया है।)

    इसकी आवश्यकता क्यों है ?

    i) युवाओं की जिज्ञासा जगाकर उनको पढ़ने के लिए उद्युक्त करना। ii) प्रवचनों को अनुसंधान की दृष्टि से सुलभ करना। iii) धर्म परिवर्तन के जाल में फंसने वाले नवयुवकों को बुद्धिगम्य एवं वैज्ञानिक खादपानी देकर उनको पहले ही इम्यून कर देना या vaccinate कर देना।

    कॉलेज के नए-नए लड़के-लड़कियों को जिहादी या ईसाई मिशनरी बरगलाते हैं कि आपका धर्म तो ऐसा है और वैसा है; यह कहकर उनको जो कुतर्क जाकिर नाईक (इस्लामिक आतंकवादियों का मास्टरमाइंड) दिया करता था वही तर्क देकर हिंदू धर्म के प्रति घृणा एवं अपने प्रति न्यूनगंड की भावना निर्मित की जाती है, और फिर उन्हें धर्म परिवर्तित किया जाता है। मूर्ति पूजा, पुनर्जन्म, हिंदू धर्म, संस्कार, ध्यान, योग, बहूदेवता, अनेक प्रथा और मान्यताओं के विषय में युवाओं के मन में प्रश्न चिन्ह होते हैं जिसका फायदा उठाकर हिंदू युवाओं के बुद्धि को भ्रमित किया जाता है। इस बहकावे को पहले ही निरस्त करने के लिए (to nib the problem in the bud) हमें स्वामी जी के प्रवचनों के Themewise Content पर काम करना चाहिए। यह कुछ कठीन काम नहीं है।

  7. स्वामी विवेकानंद और रामकृष्ण परमहंस की पुस्तकों को हर हालत में बेशर्त प्राथमिकता दी जानी चाहिए:- मेरे अनुसंधान में यह बात सामने आयी है कि स्वामी विवेकानंद और रामकृष्ण परमहंस की पुस्तकें (समग्र विवेकानंद और वचनामृत, एवं दोनों की जीवनीयाँ) दुय्यम हो गई है, और रामकृष्ण मठ-मिशन के अन्य सन्यासियों की पुस्तकें ही जोर-शोर से आकर्षक टाइटल्स में परोसी जा रही है, उनका ही प्रचार-प्रसार हो रहा है, भले ही उन किताबों में कुछ नई बात न भी हो; यह बड़े खेद की बात है। वस्तुत: रामकृष्ण और विवेकानंद के पुस्तकों का कोई जवाब नहीं; वे लाजवाब है। अतः उनकी पुस्तकों को ही सर्वप्रथम पढ़ने की युवाओं को सूचना की जानी चाहिए, उनके पुस्तकों को प्राथमिकता (priority) दी जानी चाहिए। यह एक महत्वपूर्ण एवं pivotal धोरण (Policy) होना चाहिए।

    कुछ पुस्तकों के Titles Misleading है, उदाहरण के लिए- ‘ध्यान और उसके प्रकार’ यह पुस्तक। इस पुस्तक में ध्यान के प्रकार नहीं दिए गये। मुझे बहुत लोगों ने यह बात कही है, और मेरे स्वयं का भी यह अनुभव है। इसके लिए दो बातें की जा सकती है। i) जो लोग किताबें बेचते हैं उन्हें यह निर्देश दिए जाने चाहिए कि वह वाचकों को पहले स्वामी विवेकानंद और रामकृष्ण परमहंस की पुस्तकों को पढ़ने की सूचना दें। ii) पुस्तकों की सूची (List of the books) में स्वामी विवेकानंद और रामकृष्ण परमहंस की पुस्तकों के शीर्षकों को Bold font में किया जाय।

  8. हर पुस्तक में स्वामी विवेकानंद और श्रीरामकृष्ण परमहंस के पुस्तकों की सूची का एक पृष्ठ पीछ़े होना चाहिए।

  9. स्वामी विवेकानंद के समग्र साहित्य की रूपरेखा क्या है इस पर एक पृष्ठ होना चाहिए। अधिकांश लोग स्वामी जी की चार-छह छोटी-मोटी किताबें पढ़कर इस भ्रम में रह जाते हैं कि हमनें स्वामी विवेकानंद की सभी पुस्तकें पढ़ ली। समग्र स्वामी विवेकानंद (Complete works of Swami Vivekanand) ऐसी भी कोई चीज होती है यह उन्हें पता भी नहीं होता। और आपको जानकर आश्चर्य होगा कि यह भ्रम पालने वालों में प्रोफेसर्स, टीचर्स, डॉक्टर्स, इंजीनियर्स, तक लोग है; साधारण विद्यार्थि युवाओं की तो बात ही क्या!

  10. पुस्तकों की कीमतें Round figure में होनी चाहिए:- इससे लेन-देन की व्यवहारिकता में सरलीकरण होगा। जो लोग ग्राउंड वर्क कर रहे हैं, गलीकुचे में जाकर बेच रहे है, door to door जाकर प्रचार-प्रसार कर रहे है, उनको आसानी होगी। यह इसलिए ताकि छुट्टे या खुले पैसों की समस्या ना रहे। अक्सर लोग एक-दो रूपये के लिए अड़कर या अकड़कर बैठ जाते हैं, और ऐन वक्त पर छुट्टे नहीं होते। इसलिए यह कदम ज़रूरी है। उदाहरण के लिए- किसी पुस्तक की कीमत ₹- 23 न होकर ₹- 25 हो; ₹-07 न होकर ₹-10 हो।

  11. ‘यीशु ख्रिस्त म्हणतात’ (Thus spoke Jesus’), ‘पैगंबर मोहम्मद म्हणतात’ (Thus spoke Mohammed), ‘ईसा मसिह’ (हिन्दी), इत्यादि यह रामकृष्ण मठ द्वारा प्रकाशित पुस्तिकाओं का हिंदुओं के धर्म परिवर्तन के लिए दुरुपयोग किया जा रहा है, किया जाता रहा है। (इसमें साने गुरुजी की मोहम्मद साहब पर लिखी पुस्तक भी शामिल है।) अगर रामकृष्ण मठ-मिशन को इस्लाम तथा मोहम्मद साहब पर पुस्तक छापने ही है तो जो भी कुरान में दिया गया है वह जैसा है वैसा उसमें जिहाद एवं काफिरों के संदर्भ की आयतों समेत छापना चाहिए, न की Selected quotes; अगर रामकृष्ण मठ-मिशन को इस्लाम पर कुछ छापना ही है तो स्वामी विवेकानंद अपने समग्र साहित्य में इस्लाम एवं मोहम्मद साहब पर जो भी बात करते हैं वह पूरी बात का एक पुस्तक छापना उचित होगा, न की Selected lines. अतः इस बात को गंभीरता से लेते हुए रामकृष्ण मठ-मिशन ऊपरीनिर्दिष्ट पुस्तिकाओं को पुस्तक सूची से हटा दें, withdraw कर लें, और इसको out of print कर दें, इसी में मानवता एवं सत्य के प्रति, हिंदू धर्म के प्रति वफादारी होगी। इस संदर्भ में और अधिक क्या लिखना? रामकृष्ण मठ-मिशन के सन्यासी देश और धर्म के प्रति जागरूक एवं निष्ठावान होते हैं।

  12. सामान्यतः यह देखा जाता है कि रामकृष्ण मिशन के अस्पतालों में इलाज पाकर लाखों लोग यूंही चले जाते हैं। उनको ना तो रामकृष्ण-विवेकानंद से कोई मतलब होता है और न ही सन्यासीजन निष्काम सेवारत है उसे त्याग भावना से। इसमें सभी धर्म के लोग होते हैं। साथ ही साथ यह भी देखा जा सकता है कि रामकृष्ण मिशन के अस्पतालों का ज्यादा से ज्यादा उपयोग हिंदू धर्मियों से अधिक अन्य धर्मीय ही करते हैं। यह ऐसे लोग होते हैं जिनके मजहब मैं ही हिंदू धर्म को मिटाने की बात की गई है। इसके अनुरूप इनके षडयंत्र सब दूर चल रहे हैं। यह ऐसे लोग है जिनका रामकृष्ण-विवेकानंद में तिनके इतना भी विश्वास एवं श्रद्धा नहीं है, लेकिन उपचार एवं बड़े-बड़े ऑपरेशंस के लिए रामकृष्ण मिशन के अस्पतालों में पहुंच जाते हैं, फायदा उठाते हैं, और मन ही मन में उनको शत्रु मानते हैं। (मैं यह कतई नहीं कह रहा हूँ कि इनको भगा दिया जाय, लेकिन-)

    जिनको आंखें हैं वह देख सकते हैं, साक्षी भाव है वह देख सकते हैं कि रामकृष्ण मिशन के अस्पताल और भारत सरकार के ‘सरकारी अस्पतालों’ में कोई भेद नहीं रह गया है। कुछ तो माफक एवं न्यूनतम (Minimum) भेद होना ही चाहिए।

    बड़ी जिम्मेदारी के साथ में यह कह रहा हूं की यह स्थिति को हम बदल सकते हैं, सकारात्मक कुछ बदलाव ला सकते हैं। हमें क्या करना चाहिए?

    रामकृष्ण मिशन के अस्पतालों का यह नया नियम होना चाहिए कि जो भी मरीज इलाज के लिए आएगा उसको-

    i) छोटे इलाज के लिए कोई भी छोटी पुस्तक (e.g. ₹-15 से 25 तक) ii) बड़े इलाज के लिए रामकृष्ण या विवेकानंद की कुछ पुस्तकें- उदाहरण के लिए- (ज्ञान योग, कर्म योग राज योग, भक्ति योग, आदि।) iii) बड़े ऑपरेशंस के लिए- (समग्र विवेकानंद एवं रामकृष्ण मठ की सभी प्रकाशित पुस्तकें खरीदनी होगी। यह पैसा फीस में ऐड कर दिया जाय।)

    चाहे मरिज किसी भी धर्म या मज़हब का हो, उन्हें यह पुस्तकें खरीदना अनिवार्य होगा; यह नही कि इनको भगा दिया जाय, लेकिन रामकृष्ण-विवेकानंद का कुछ साहित्य खरीदना, इतनी सी माफक बात को उन्होनें इन्कार नहीं करना चाहिए। अगर रामकृष्ण मिशन के अस्पताल में कम पैसे में इलाज करवाना हो तो कम से कम यह पुस्तकें खरीदना अनिवार्य (unavoidable and mandatory) होना चाहिए। इस कदम से उन मरीजों का भी कम पैसे में इलाज होगा, उनको रामकृष्ण-विवेकानंद के साहित्य की सौगात मिलेगी जो अपने आप में उनके लिए एक अनमोल उपलब्धि होगी, और रामकृष्ण मिशन का कार्य भी इन लोगों के माध्यम से प्रचार-प्रसारित होगा। (पचास हजार के operation के लिए आठ-दस हजार की पुस्तकें खरीदना, कोई घाटे की बात तो है नहीं।)

    (जो लोग ठाकूर और विवेकानंद को लाथ मारते हो, और उनकी पुस्तकें भी उन्हें नहीं चाहिए, लेकिन उनके अस्पतालों में इलाज मुफ्त चाहिए, क्या ऐसे लोगों को रामकृष्ण मिशन उपचार देना चाहेगा?? गुरूद्वारा में भी यह नियम है कि अगर आपको लंगर में भोजन करना हो, और गुरूद्वारा में ठहरना हो तो, कम से कम गुरूग्रंथ साहिब के सामने मत्था ज़रूर टेकना पड़ता है। इसीलिए मैं कह रहा हूँ कि सरकारी अस्पताल और रामकृष्ण मिशन द्वारा चलाये जाने वाले अस्पतालों में इतना माफक फर्क तो होना ही चाहिए, इतनी माफक अपेक्षा होनी चाहिए कि वे साहित्य खरीदें.

  13. युवा लोग टाइटल्स देखकर खरीदते हैं। इसी कारण से प्रभावी Titles होने चाहिए, और उस चुने हुए शीर्षक के अंतर्गत स्वामी जी के विविध प्रवचनों में जो भी उस विषय के संदर्भ में दिया गया है उसका समावेश होना चाहिए। उदा:- i) ‘व्यक्तित्व विकास’ इस शीर्षक के अंतर्गत स्वामी जी के व्याख्यानों की एक बड़ी पुस्तक होनी चाहिए। वर्तमान में मठ द्वारा प्रकाशित ‘व्यक्तिमत विकास’ इस शीर्षक के नाम से जो चुनिंदा वचनों की पुस्तिका है, वह चिंधी-चिंधी (rag-tag) और पूर्ण रूप से विषय का प्रतिपादन न करने वाली है। आज तक रामकृष्ण संघ इतने अच्छे शीर्षक का फायदा नहीं उठा पाया है, यह दुखद है।

    ii) ‘राजयोग’ के अंतर्गत जो भी स्वामी विवेकानंद के समग्र साहित्य में ध्यान, प्राणायाम, एकाग्रता इत्यादि के विषय में आता है, जो भी miscellaneous प्रवचन है, उन सभी को ‘राजयोग’ के Appendix section में स्थान देना चाहिए। ऐसी कुछ महत्तपूर्ण सूचनाएँ है जो राजयोग के अभ्यासकों के लिए अत्तवश्य है और जो समग्र साहित्य में तो है लेकिन ‘राजयोग’ में नहीं है, उन सभी का समावेश इस Appendix में होना चाहिए। (‘राजयोग’ एक ऐसा अद्वितिय ग्रंथ है जिसके अकेले के दम पर रामकृष्ण-विवेकानंद का, और हिन्दूधर्म का बेड़ा चल सकता है, अगर उनका अन्य साहित्य मिट भी जाय।)

    iii) ‘ज्ञानयोग’ में ज्ञानयोग के संदर्भ में जो भी समग्र विवेकानंद साहित्य में कहा गया है वह Appendix section में जोड़ दिया जाय, उदा- ‘ज्ञान मार्ग पर दिए गए अन्य प्रवचन’ वाली पुस्तिका, और अन्य जगहों पर जो भी ज्ञानयोग के बारे में कहा गया है।

    iv) ‘प्रेमयोग’ नाम का भिन्न कोई योग स्वामी विवेकानंद ने कभी कहा नहीं है। मूलतः विवेकानंद ने पांच योगों का उल्लेख किया है- हठयोग, ज्ञानयोग, ध्यानयोग, भक्तियोग, और कर्मयोग। इनमें भी चार योगों को राजयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग, और कर्मयोग को विवेकानंद ज्यादा महत्व देते हैं। प्रेमयोग की बात कभी विवेकानंद ने की नहीं और जो भी प्रेमयोग नाम से प्रवचन है वह सब पराभक्ति पर दिए गए हैं जिसका स्पष्ट उल्लेख बार-बार वहां मिलता है। ‘प्रेमयोग’ नाम सुनकर लोग गफ़लत में पड़ जाते हैं कि चार योग कहे हैं तो फिर और एक अन्य योग प्रेमयोग कहां से आ गया? अतः प्रेमयोग के जो प्रवचन है वह सभी ‘पराभक्ति’ के शीर्षक से भक्तियोग में समाविष्ट कर दिए जाने चाहिए। वस्तुतः वे भक्तियोग का ही एक अविभाज्य हिस्सा है।

    v) ‘आत्म साक्षात्कार साधना और सिद्धि’ नामक शीर्षक के पुस्तक में विवेकानंद के अन्य संबंधित प्रवचनों, स्फुट लेखों को समाविष्ट किया जा सकता है। इसका शीर्षक दमदार और लोकप्रिय है।

  14. स्वामी विवेकानंद के समग्र साहित्य (10 खंडों) को बहुत ज्यादा छोटी-छोटी पुस्तकों में नहीं बांटना चाहिए, अर्थात् जो मूल ग्रंथ है वह उनके मूल स्वरूप में ही रहेंगे, उदाहरण के लिए- कर्मयोग, ज्ञानयोग, राजयोग, भक्तियोग आदि, लेकिन इनके बावजूद अन्य जो उनके प्रवचन, व्याख्यान एवं स्फूट लेख है उनकी बहुत छोटी-छोटी पुस्तकें निर्मित करने से वाचकों के और वह भी जो विद्यार्थी दशा से अभी निकले हैं, मन में संभ्रम उत्पन्न होता है। दो-चार पुस्तकें पढ़कर उनको ऐसा प्रतीत होता है कि उन्होंने विवेकानंद को पढ़ लिया। ऐसा इसलिए है कि उनको समग्र साहित्य नाम की कोई चीज होती है यह पता नहीं होता। यह मैं सैकड़ो युवाओं से बात करके कह रहा हूं, केवल हवा में बात नहीं कर रहा हूं।

  15. ‘Love Jihad’ और ‘हिंदू धर्म के विरूध्द षडयंत्र’ इन शीर्षकों से रामकृष्ण मठ द्वारा प्रकाशित दो नयी पुस्तकें होनी चाहिए। मुझे पता है कि मठ-मिशन ऐसी पुस्तकें नहीं छापेंगे, लेकिन हिंदू युवतियों को जिस बेरहमी से sex एवं हिंसा का शिकार बनाया जा रहा है, संन्यासीयों से मेरी हाथ जोड़ कर बिनती होगी कि कम से कम अपने व्याख्यानों एवं प्रवचनों और प्राइवेट वार्तालापों में इन विषयों को वे उठायें।

इन सूचनाओं के साथ पुन: एक बार रामकृष्ण संघ के सभी ब्रह्मचारी,संन्यासी तथा त्यागमय जीवन जीने वाले अन्य भक्तों को धन्यवाद एवं प्रणाम करके यह लेख समाप्त करता हूँ।

ॐ रामकृष्णाय नम:। ॐ महाकाली नम:।🙏