वैदिक चिन्तन में ‘अर्थ’ केवल आर्थिक संपदा का नाम नहीं है, वरन् वह द्वितीय पुरुषार्थ है जो धर्म और काम के बीच सेतु का कार्य करता है। ऋग्वेद से लेकर उपनिषदों तक यह स्पष्ट किया गया है कि संसार की सभी गतियाँ अर्थ पर आश्रित हैं, किन्तु अर्थ का सदुपयोग या दुरुपयोग पूर्णतः व्यक्ति की बुद्धि के निर्णय पर निर्भर करता है। यह निर्णय ही यह तय करता है कि अर्थ भोग-विलास में लीन होकर व्यक्ति को बाँधेगा या धर्म के मार्ग में लगकर अधिक लोगों को सत्य की ओर अग्रसर करेगा।
१. पुरुषार्थ-चतुष्टय में अर्थ की प्रतिष्ठा
वैदिक ऋषियों ने मानव-जीवन के चार साध्य निर्धारित किए – धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष। इनमें अर्थ का स्थान धर्म के ठीक बाद रखा गया है। तैत्तिरीय उपनिषद् (१.११.१) में कहा गया है –
“धर्मं चर, अर्थं चर, कामं चर, मोक्षं चर।”
अर्थात धर्म का आचरण करो, अर्थ का आचरण करो, काम का आचरण करो और मोक्ष का आचरण करो। यहाँ ‘आचरण’ शब्द विशेष महत्व रखता है। अर्थ का आचरण अर्थात अर्जन, संरक्षण और विनियोग सभी एक नियमबद्ध प्रक्रिया है, न कि केवल संग्रह की प्रवृत्ति। महर्षि दयानन्द सरस्वती ने अपने भाष्यों में स्पष्ट किया है कि अर्थ वह साधन है जिससे धर्म की स्थापना होती है; अर्थहीन व्यक्ति धर्म का पालन करने में असमर्थ होता है, क्योंकि धर्म के अधिकांश कृत्य (यज्ञ, दान, अतिथि-सेवा, राष्ट्र-रक्षा) अर्थ-सापेक्ष हैं।
२. अर्थ और ‘ऋत’ का सम्बन्ध : केवल भोग नहीं, व्यवस्था
वैदिक विश्व-दृष्टि में सृष्टि ‘अर्थ’ से नहीं, ‘ऋत’ (ब्रह्माण्डीय ऋतु, सत्य, व्यवस्था) से संचालित होती है। किन्तु ‘ऋत’ की स्थापना के लिए अर्थ आवश्यक माध्यम है। शतपथ ब्राह्मण (५.४.४.५) में विधान है कि यज्ञ के लिए धन की आवश्यकता होती है, और यज्ञ ही ऋत का संरक्षण करता है। इस प्रकार अर्थ धर्म का सहायक बनता है। यदि अर्थ ऋत से विच्छिन्न हो जाए तो वह ‘अनर्थ’ में परिणत हो जाता है।
अथर्ववेद (३.२४.१) में राजा को निर्देश दिया गया है –
“अर्थं चार्थेन संभर, धर्मं च धर्मेण संभर।”
अर्थात अर्थ को अर्थ (न्याय, उचित साधन) से संग्रह करो, और धर्म को धर्म (सदाचार) से संग्रह करो। इससे स्पष्ट है कि वैदिक दृष्टि में अर्थ का स्रोत और उपयोग दोनों ही धर्म के अधीन हैं।
३. बुद्धि : अर्थ के विनियोग की कुंजी
वैदिक ग्रन्थों में बुद्धि को सर्वोच्च शक्ति माना गया है। ऋग्वेद (१०.७१.२) में कहा गया है –
“बृहस्पतिः प्रथमं जायमानो महो ज्योतिषः परमे व्योमन्। सप्तास्यं जातवेदसं विवस्वान् सप्तार्चिर्यजते सप्त जिह्वाः।।”
इस मन्त्र में ‘बृहस्पति’ को बुद्धि का देवता कहा गया है। बुद्धि ही मनुष्य को ‘प्रिय’ (तात्कालिक भोग) और ‘श्रेय’ (दीर्घकालिक कल्याण) में भेद करने की क्षमता प्रदान करती है।
शतपथ ब्राह्मण (१०.६.५.४) में स्पष्ट विवेचन है कि मनुष्य की बुद्धि ही उसे यह निर्णय देती है कि वह संचित अर्थ को केवल अपने इन्द्रिय-सुखों पर व्यय करे या उसे यज्ञ, दान, विद्या और राष्ट्र-रक्षा में लगाए। जो बुद्धि अर्थ को धर्म के अधीन करती है, वह ‘प्रज्ञा’ कहलाती है; जो अर्थ को केवल काम में लगाती है, वह ‘मोहिनी’ है।
४. भोग का वैदिक समावेश : संयम ही साधना
वैदिक परम्परा में भोग का पूर्ण निषेध नहीं है। गृहस्थाश्रम में अर्थोपार्जन और काम-भोग दोनों को स्थान दिया गया है, किन्तु उनकी सीमा धर्म द्वारा निर्धारित है। ऋग्वेद (१०.११७.८) में कहा गया है –
“न स पुमानस्ति यो अन्ति धन्वा न सो अश्नाति यो अन्ति पक्वम्। न सो जीवति यो अन्ति सत्यं न सो बुध्यते यो अन्ति धर्मम्।।”
अर्थात वह पुरुष नहीं है जो धन के पास न हो, वह भोजन नहीं करता जो पके हुए अन्न के पास हो, वह जीवित नहीं जो सत्य के पास हो, वह बुद्धिमान नहीं जो धर्म के पास हो। यह मन्त्र संकेत करता है कि धन, अन्न, सत्य और धर्म – ये चारों एक-दूसरे के पूरक हैं। भोग के लिए अर्थ आवश्यक है, पर वह भोग भी धर्म के अधीन हो तभी वह ‘जीवन’ कहलाता है, अन्यथा वह केवल ‘जीविका’ मात्र रह जाता है।
५. यज्ञ, दान और लोकसंग्रह : अर्थ का उत्कृष्ट विनियोग
वैदिक ग्रन्थों में अर्थ के सर्वोत्तम विनियोग के रूप में ‘यज्ञ’ और ‘दान’ को स्थान दिया गया है। यहाँ ‘यज्ञ’ केवल अग्नि में आहुति देने का कर्मकाण्ड नहीं, अपितु समाज-हित के समस्त कार्य हैं। ऋग्वेद (१.१.४) में यज्ञ को ‘विश्वकर्मा’ की संज्ञा दी गई है। तैत्तिरीय उपनिषद् (१.११.४) में शिक्षा है –
“अन्नं न निन्द्यात्… अन्नं बहु कुर्वीत। न कञ्चन वसतौ प्रत्याचक्षीत।”
अन्न (अर्थ का एक रूप) की निन्दा न करो, अन्न का अपवाद न करो, बहुत अन्न उत्पन्न करो, और किसी को भी अपने घर से खाली हाथ न लौटाओ। यह दर्शाता है कि अर्थ का संग्रह व्यक्तिगत भोग के लिए न होकर ‘वसतौ’ (समाज, आश्रम) के सब प्राणियों के पोषण के लिए हो।
मनुस्मृति (४.२२६) में भी कहा गया है –
“यथा नदीनदाः सर्वे सागरे यान्ति संस्थितिम्। तथा सर्वाणि कर्माणि धर्मे यान्ति संस्थितिम्।।”
जैसे सभी नदियाँ समुद्र में समा जाती हैं, वैसे ही सभी कर्म – चाहे अर्थ-सम्बन्धी हों या काम-सम्बन्धी – अन्ततः धर्म में ही स्थिर होने चाहिए। यही वैदिक दृष्टि का मूल है।
६. अर्थ और अनर्थ का द्वन्द्व
वैदिक साहित्य में ‘अर्थ’ का विलोम ‘अनर्थ’ बताया गया है। अनर्थ वह स्थिति है जहाँ अर्थ धर्म से विलग होकर केवल व्यक्तिगत स्वार्थ, अहंकार या अन्याय के लिए उपयोग किया जाता है। ऐतरेय ब्राह्मण (३.३) में वर्णन है कि जब राजा अर्थ का दुरुपयोग करता है, तो प्रजा में अधर्म बढ़ता है और अन्ततः वह अर्थ नष्ट हो जाता है। अथर्ववेद (११.३.८) में स्पष्ट चेतावनी है –
“अर्थो हि कामः स हि धर्म उच्यते।”
अर्थ ही काम है, और वही धर्म कहलाता है – अर्थात जो अर्थ धर्मपूर्वक अर्जित और धर्मपूर्वक व्यय किया जाता है, वही वास्तव में धर्म का सहायक है। शेष सब ‘अनर्थ’ है, जो अन्ततः विनाश का कारण बनता है।
७. वैदिक शासन-व्यवस्था में अर्थ का प्रबन्धन
वैदिक काल में अर्थ का प्रबन्धन केवल व्यक्ति के विवेक पर नहीं छोड़ा गया था। राजा (शासन) का कर्तव्य था कि वह प्रजा के अर्थ की रक्षा करे, असमानता को रोके, और अर्थ का प्रवाह धर्म की ओर सुनिश्चित करे। अथर्ववेद (३.४.२) में राजा के लिए कहा गया है –
“सम्राट् विराट् स्वराट् छन्दः।”
अर्थात राजा ‘सम्राट्’ (सम्यक् राजा) तभी कहलाता है जब वह अर्थ का सम्यक् वितरण करे। शतपथ ब्राह्मण (५.३.३.१२) में उल्लेख है कि राज्य का कोष (अर्थ) यदि धर्म-कार्यों में न लगाया जाए तो वह राजा के लिए ‘विष’ बन जाता है।
८. निष्कर्ष : अर्थ साध्य नहीं, साधन है
वैदिक दृष्टिकोण में अर्थ का महत्व इसलिए नहीं कि वह संसार का केन्द्र है, बल्कि इसलिए कि वह धर्म का आधार है। संसार अर्थ से घूमता है, यह एक प्रत्यक्ष सत्य है; किन्तु वैदिक ऋषि इससे आगे बढ़कर कहते हैं कि इस अर्थ को किस दिशा में घुमाया जाता है – यही मानव-बुद्धि की कसौटी है। यदि बुद्धि अर्थ को धर्म से जोड़ती है, तो वह ‘लक्ष्मी’ (समृद्धि जो मोक्ष का द्वार खोलती है) बन जाता है; यदि बुद्धि अर्थ को केवल भोग और स्वार्थ से जोड़ती है, तो वह ‘ऋण’ (बन्धन) बनकर रह जाता है।
तैत्तिरीय उपनिषद् (२.५.१) का सूत्र इस विवेचन का समापन बिन्दु है –
“सत्यं ज्ञानं अनन्तं ब्रह्म।”
सत्य, ज्ञान और अनन्त ही ब्रह्म है। अर्थ उस ब्रह्म की प्राप्ति का एक मार्ग है, बशर्ते वह सत्य (धर्म) और ज्ञान (बुद्धि) के अधीन हो। जब व्यक्ति अपने अर्जित अर्थ को ‘अधिक लोगों को सत्य के रास्ते पर चलाने’ में लगाता है, तो वह वैदिक ऋषि की सर्वोच्च कसौटी पर खरा उतरता है।
संदर्भ सूची (References)
- ऋग्वेद – मण्डल १, सूक्त १, १५५; मण्डल १०, सूक्त ७१, ११७।
- अथर्ववेद – काण्ड ३, सूक्त ४, २४; काण्ड ११, सूक्त ३।
- शतपथ ब्राह्मण – काण्ड ५, अध्याय ३, ४; काण्ड १०, अध्याय ६।
- तैत्तिरीय उपनिषद् – शीक्षावल्ली, अनुवाक १, ११; ब्रह्मानन्दवल्ली, अनुवाक ५।
- ऐतरेय ब्राह्मण – अध्याय ३।
- बृहदारण्यक उपनिषद् – अध्याय १, ब्राह्मण ४।
- महर्षि दयानन्द सरस्वती – ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका एवं संस्कारविधि।