प्रस्तावना : लोक में अक्षय तृतीया

अक्षय तृतीया को हिंदू संस्कृति में अत्यंत शुभ माना जाता है। इस दिन सोना, चाँदी, जमीन, गाड़ी, वस्त्र – जो कुछ भी खरीदा जाता है या दान किया जाता है, वह ‘अक्षय’ (कभी न नष्ट होने वाला) हो जाता है, ऐसी मान्यता है। व्यापारी नए खाते खोलते हैं, लोग सोने के आभूषण खरीदते हैं – सब कुछ शाश्वत सुख और समृद्धि की कामना से।

लेकिन क्या यह सच में अक्षय है? क्या बैंक का पैसा, सोने के गहने, मकान, गाड़ी – क्या ये कभी नष्ट नहीं होते? मृत्यु के क्षण में इनमें से क्या हमारे साथ जाता है?

अद्वैत वेदांत का उत्तर : केवल आत्मा ही अक्षय है

अद्वैत वेदांत स्पष्ट कहता है – ब्रह्म सत्यं, जगन्मिथ्या। इस जगत का हर पदार्थ क्षयशील है। सोना-चाँदी रूप, रंग, भार में बदलता है; शरीर बूढ़ा होकर मरता है; धन चोरी, कर, दुर्घटना या मृत्यु से नष्ट हो जाता है। इसलिए यह ‘क्षय’ है, ‘अक्षय’ नहीं।

भगवद्गीता (अध्याय 2, श्लोक 20) में श्रीकृष्ण कहते हैं:

न जायते म्रियते वा कदाचित्… आत्मा न कभी जन्म लेती है, न मरती है। यह अजर, अमर, अविनाशी है।

वही एकमात्र अक्षय तत्व है – हमारा शुद्ध चैतन्य स्वरूप, जिसे ‘सच्चिदानंद ब्रह्म’ कहते हैं।

साधना का धन : एकमात्र अक्षय संपत्ति

यहाँ आपके सुझाया गया महत्वपूर्ण बिंदु आता है:

“अक्षय वही है जो अपनी साधना है। इस जीवन के बाद साधना का धन अगले जन्म में काम आता है, पर सांसारिक धन यहीं समाप्त हो जाता है।”

इसे विस्तार से समझते हैं।

साधना क्या है?

अद्वैत वेदांत में साधना का अर्थ केवल पूजा-पाठ या तीर्थयात्रा नहीं है। साधना है – श्रवण (शास्त्र सुनना), मनन (चिंतन), निदिध्यासन (गहन ध्यान) – जिससे ‘मैं शरीर नहीं, आत्मा हूँ’ का अनुभव दृढ़ हो। साधना का तात्पर्य है – अहंकार, कामना, क्रोध, लोभ को धीरे-धीरे घटाना और नित्य शुद्ध ब्रह्म में स्थित होने का अभ्यास करना।

जब आप सत्य का ध्यान करते हैं, दान नि:स्वार्थ भाव से देते हैं, अहिंसा का पालन करते हैं, किसी को धोखा नहीं देते, मन को नियंत्रित करते हैं – यह सब साधना-धन का संचय है।

क्यों साधना का धन अक्षय है?

हमारे मन में संस्कार रूप में सब कुछ जमा होता है। कोई भी शुभ कर्म, कोई भी ध्यान, कोई भी सत्य की ओर बढ़ने का प्रयास – यह सूक्ष्म रूप में चित्त पर छाप छोड़ता है। जब यह शरीर मरता है, तो स्थूल धन, परिवार, नाम, पद – सब यहीं रह जाता है। लेकिन साधना के संस्कार आत्मा के साथ अगले जन्म में जाते हैं। वे ही अगले जन्म में मनुष्य की प्रवृत्ति, रुचि, योग्यता, और मोक्ष के निकटता का निर्धारण करते हैं।

यही कारण है कि शास्त्र कहते हैं – ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते’ – आपको केवल कर्म (साधना) करने का अधिकार है, फलों पर नहीं। क्योंकि फल तो नश्वर हैं, पर साधना के संस्कार अक्षय हैं।

सांसारिक धन क्यों यहीं समाप्त?

चाहे आपके पास अरबों की संपत्ति हो, मृत्यु के समय आप अपने साथ एक रुपया भी नहीं ले जा सकते। मिट्टी का बना शरीर मिट्टी में मिल जाता है। जो वस्तुएँ पाँच तत्वों से बनी हैं (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश), वे पाँच तत्वों में विलीन हो जाती हैं। इसलिए सांसारिक धन का अस्तित्व केवल एक जन्म तक है – यहाँ तक कि एक जन्म में भी यह स्थिर नहीं रहता (क्षयशील)।

अद्वैत का निष्कर्ष : तीन अवस्थाओं के पार जाओ

अक्षय तृतीया पर ‘तृतीया’ का अर्थ है – तीन अवस्थाएँ: जागृत, स्वप्न, सुषुप्ति। और तीन गुण: सत्व, रज, तम। इन सबके परे तुरीय अवस्था है – शुद्ध चैतन्य। उसी का नाम अक्षय है।

तो इस पवित्र दिन हम क्या करें?

· बाह्य दृष्टि से : दान करें, सत्कर्म करें, किंतु यह जानते हुए कि यह साधना का एक अंग है, अंतिम सत्य नहीं। · आंतरिक दृष्टि से : कुछ समय मौन बैठें, अपने भीतर उस अविनाशी स्वरूप का ध्यान करें। पूछें – ‘मैं कौन हूँ?’ जो शरीर, मन, बुद्धि, धन से परे है।

प्रार्थना

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥

(वह ब्रह्म पूर्ण है, यह दृश्य जगत भी पूर्ण प्रतीत होता है, क्योंकि पूर्ण ब्रह्म से ही यह उत्पन्न हुआ है। पूर्ण में से पूर्ण को निकालने पर भी पूर्ण ही शेष रहता है।)

उसी पूर्ण, अक्षय, अद्वैत ब्रह्म में हमारा नमन। यही सच्ची अक्षय तृतीया है।