प्रतीत्यसमुत्पादहृदयकारिका
यहाँ प्रस्तुत है आचार्य नागार्जुन द्वारा रचित प्रतीत्यसमुत्पादहृदयकारिका का संस्कृत श्लोक एवं हिन्दी अनुवाद:
॥ प्रतीत्यसमुत्पादहृदयकारिका ॥
श्लोक १: द्वादश येऽङ्गविशेषा मुनिनोद्दिष्टाः प्रतीत्यसम्भूताः। ते क्लेशकर्मदुःखेषु सङ्गृहीतास्त्रिषु यथावत्॥
हिन्दी अनुवाद: जो बारह प्रकार के अंग (भवचक्र के बारह निदान) मुनि (बुद्ध) द्वारा प्रतीत्यसमुत्पाद (परस्पर कारण-कार्य रूप में) से उत्पन्न बताए गए हैं, वे यथार्थ रूप से क्लेश, कर्म और दुःख इन तीनों में ही समाविष्ट हो जाते हैं।
श्लोक २: आद्याष्टमनवमाः स्युः क्लेशाः कर्म द्वितीयदशमौ च। शेषाः सप्त च दुःखं त्रिसङ्ग्रहा द्वादश तु धर्माः॥
हिन्दी अनुवाद: इन बारह अंगों में से पहला (अविद्या), आठवाँ (तृष्णा) और नौवाँ (उपादान) - ये तीन क्लेश हैं। दूसरा (संस्कार) और दसवाँ (भव) - ये दो कर्म हैं। शेष सात (विज्ञान से लेकर भाव तक और जाति, जरा-मरण) दुःख हैं। इस प्रकार तीन (क्लेश, कर्म, दुःख) के अंतर्गत ये बारह धर्म (अंग) आ जाते हैं।
श्लोक ३: त्रिभ्यो भवति द्वन्द्वं द्वन्द्वात्प्रभवन्ति सप्त सप्तभ्यः। त्रय उद्भवन्ति भूयस्तदेव [तु] भ्रमति भवचक्रम्॥
हिन्दी अनुवाद: इन तीन (क्लेशों) से दो (कर्म) उत्पन्न होते हैं। उन दो (कर्मों) से सात (दुःख रूप अंग) प्रकट होते हैं। उन सात (दुःखों) से फिर तीन (क्लेश) उत्पन्न होते हैं। इस प्रकार वही भवचक्र (संसार चक्र) बार-बार घूमता रहता है।
श्लोक ४: हेतुफलञ्च [हि]सर्वं जगदन्यो नास्ति कश्चिदिह सत्त्वः। शून्येभ्य एव शून्या धर्माः प्रभवन्ति धर्मेभ्यः॥
हिन्दी अनुवाद: यह सम्पूर्ण जगत (संसार) केवल हेतु और फल (कारण-कार्य) रूप है। यहाँ (इस जगत में) कोई अन्य ‘सत्त्व’ (आत्मा या अहंकार रूपी स्वतंत्र सत्ता) नहीं है। जो धर्म (तत्त्व) स्वयं शून्य (निःस्वभाव) हैं, वे शून्य धर्मों से ही (कारण रूप में) उत्पन्न होते हैं।
श्लोक ५: स्वाध्यायदीपमुद्रादर्पणघोषऽर्ककान्तबीजाम्लैः। स्कन्धप्रतिसन्धिरसङ्क्रमश्च विद्वद्भिरवधार्यौ॥
हिन्दी अनुवाद: पाठ (अध्ययन), दीपक (दीये की लौ), मुद्रा (छाप/टंकण), दर्पण, घोष (प्रतिध्वनि), सूर्यकान्त मणि (और अग्नि), बीज (और अंकुर) तथा अम्ल (और क्षार) की दृष्टान्त-पद्धति से विद्वान् पुरुषों को (दो बातें समझनी चाहिए:) स्कन्धों की प्रतिसन्धि (बिना किसी आत्मा के जन्म-जन्मान्तर की निरंतरता) तथा (उन्हीं का) असंक्रम (बिना एक जन्म से दूसरे जन्म में जाये)।
श्लोक ६: य उच्छेदं प्रकल्पयत्यतिसूक्ष्मेऽपि वस्तुनि। प्रतीत्यसम्भवस्यार्थमविज्ञः स न पश्यति॥
हिन्दी अनुवाद: जो मनुष्य अत्यन्त सूक्ष्म (धर्म-वस्तु) में भी (किसी सत्ता का) उच्छेद (नाश या पूर्ण विच्छेद) मान लेता है, वह अविज्ञ (अज्ञानी) प्रतीत्यसमुत्पाद के अर्थ को नहीं देख पाता।
श्लोक ७: नापनेयमतः किञ्चित् प्रक्षेप्यं नापि किञ्चन। द्रष्टव्यं भूततो भूतं भूतदर्शी विमुच्यते॥
हिन्दी अनुवाद: (इस सत्य की प्राप्ति में) न तो इस (संसार) से कुछ हटाना (अपनेय) है और न ही कुछ डालना (प्रक्षेप्य) है। केवल यथार्थ (भूत) को यथार्थ रूप से (भूततः) देखना है। जो इस यथार्थ को देख लेता है, वह (संसार बन्धन से) मुक्त हो जाता है।
॥ इति प्रतीत्यसमुत्पादहृदयकारिका समाप्ता ॥
