भगवान बुद्ध की पुराने गुरू और उनकी शिक्षायें
बुद्ध से पहले प्रचलित मत
मज्झिम निकाय के ‘अरिपरियेसन सुत्त’ (Majjhima Nikaya, 26) में बुद्ध ने विस्तार से बताया है कि गृहत्याग के बाद वे सबसे पहले आलार कालाम(आलार कलाम सांख्य दर्शन के आचार्य योगी थे)के पास गए थे। बुद्ध ने उनके प्रति सम्मान व्यक्त करते हुए उनकी शिक्षा और उसे प्राप्त करने की अपनी प्रक्रिया का वर्णन किया है। यहाँ उस घटना के महत्वपूर्ण अंश मूल पालि और हिंदी अनुवाद के साथ दिए गए हैं:
- आलार कालाम के पास गमन और प्रार्थना जब सिद्धार्थ गौतम आलार कालाम के पास पहुँचे, तो उन्होंने उनसे उनके धर्म (शिक्षा) को जानने की इच्छा प्रकट की। मूल पालि: “येनाळारो कालामो तेनुपसङ्कमि; उपसङ्कमित्वा आळारं कालामं एतदवोचं – ‘इच्छामहं, आवुसो कालामे, इमस्मिं धम्मविनये ब्रह्मचरियं चरितुं’ति।”
हिंदी अनुवाद: “जहाँ आलार कालाम थे, मैं वहाँ पहुँचा; पहुँचकर मैंने आलार कालाम से यह कहा— ‘आयुष्मान् कालाम! मैं इस धर्म-विनय में ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहता हूँ’।”
- आलार कालाम का उत्तर आलार कालाम ने सिद्धार्थ का स्वागत करते हुए कहा कि उनका धर्म ऐसा है जिसे कोई भी बुद्धिमान व्यक्ति शीघ्र ही जान सकता है। मूल पालि: “विहरतु आयुष्मान्; तादिसो अयं धम्मो यत्थ विञ्ञू पुरिसो नचिरस्सेव सकं आचरियकं सयं अभिञ्ञा सच्छिकत्वा उपसम्पज्ज विहरेय्याति।”
हिंदी अनुवाद: “आयुष्मान् (यहाँ) रहें; यह धर्म ऐसा है जिसे विज्ञ पुरुष शीघ्र ही अपने आचार्य की विद्या को स्वयं जानकर, साक्षात्कार कर और प्राप्त कर विहार कर सकता है।”
- बुद्ध द्वारा शिक्षा की प्राप्ति बुद्ध बताते हैं कि उन्होंने बहुत ही कम समय में उस शिक्षा को कंठस्थ कर लिया, लेकिन वे केवल शब्दों से संतुष्ट नहीं थे। उन्होंने ध्यान के माध्यम से उस अवस्था को प्राप्त किया जिसे आलार कालाम सिखा रहे थे— ‘आकिंचन्यायतन’ (परम शून्यवाद)। मूल पालि: “सो खो अहं, भिक्खवे, नचिरस्सेव खिप्पमेव तं धम्मं परियापुणिं… तस्स धम्मस्स सच्छिकिरियाय सम्मन्नगामि।”
हिंदी अनुवाद: “भिक्षुओं! मैंने शीघ्र ही उस धर्म को सीख लिया… और उस धर्म के साक्षात्कार के लिए प्रयत्न करने लगा।“
बुद्ध का निष्कर्ष (असंतुष्टि)
आलार कालाम ने सिद्धार्थ को अपने बराबर का स्थान दिया और साथ मिलकर संघ चलाने का प्रस्ताव दिया, लेकिन बुद्ध को लगा कि यह परम सत्य नहीं है। मूल पालि: “तस्स मय्हं, भिक्खवे, एतदहोसि – ‘नायं धम्मो निब्बिदाय न विरागाय न निरोधाय न उपसमाय न अभिञ्ञाय न सम्बोधाय न निब्बानाय संवत्तति, यावदेव आकिञ्चञ्ञायतनूपपत्तिया’ति।”
हिंदी अनुवाद: “भिक्षुओं! तब मुझे ऐसा विचार हुआ— ‘यह धर्म निर्वेद (वैराग्य) के लिए, विराग के लिए, निरोध के लिए, शांति के लिए, विशेष ज्ञान के लिए, संबोधि के लिए और निर्वाण के लिए नहीं है; यह केवल आकिंचन्यायतन (शून्यता की अवस्था) की प्राप्ति कराने वाला है’।”
आलार कालाम ने बुद्ध से कहा था, “जैसा मैं हूँ वैसे तुम हो, जैसा तुम हो वैसा मैं हूँ।” (यह वचन सामवेद, और छांदोग्य उपनिषद के वचन तत्वमसि जैसा है)उन्होंने बुद्ध को अपने शिष्यों का सह-शास्ता बनने का निमंत्रण दिया था। बुद्ध के अनुसार, कालाम की पद्धति मन की एक उच्च अवस्था (समाधि) तो प्रदान करती थी, लेकिन वह ‘अविद्या’ का पूर्ण नाश नहीं करती थी और न ही जन्म-मरण के चक्र से पूरी तरह मुक्त करती थी। इसी कारण बुद्ध उन्हें छोड़कर आगे बढ़ गए।
आलार कालाम को छोड़ने के बाद बुद्ध (सिद्धार्थ) उद्दक रामपुत्त के पास गए। आलार कालाम ने जहाँ ‘आकिंचन्यायतन’ (शून्यता) तक की शिक्षा दी थी, उद्दक रामपुत्त के पास सिद्धार्थ ने एकाग्रता की उससे भी सूक्ष्म अवस्था सीखी। उद्दक रामपुत्त या उद्रक रामपुत्र मुख्य रूप से योग और ध्यान के आचार्य थे। वे किसी एक विशिष्ट “दर्शन” (जैसे सांख्य, वेदांत या बौद्ध) के संस्थापक या प्रमुख आचार्य नहीं माने जाते, बल्कि अरूप ध्यान (निराकार ब्रह्म)के उच्च स्तर के विशेषज्ञ थे।
वे गौतम बुद्ध के दूसरे गुरु थे इसका वर्णन भी मज्झिम निकाय के ‘अरिपरियेसन सुत्त’ में मिलता है:
उद्दक रामपुत्त के पास पहुँचना
सिद्धार्थ ने जब देखा कि आकिंचन्यायतन से पूर्ण शांति नहीं मिली, तो वे और भी ऊँचे सत्य की खोज में निकल पड़े। मूल पालि: “सो खो अहं, भिक्खवे, आकिञ्चञ्ञायतनधम्मेन अतलियमानो… येन उद्दको रामपुत्तो तेनुपसङ्कमि।”
हिंदी अनुवाद: “भिक्षुओं! मैं आकिंचन्यायतन धर्म से संतुष्ट न होकर (परम सत्य की खोज में)… जहाँ उद्दक रामपुत्त थे, वहाँ पहुँचा।” 2. ‘नेवसंज्ञा-नासंज्ञायतन’ की प्राप्ति(नेति नेति या ना अस्ति नास्ति) उद्दक रामपुत्त ने उन्हें वह साधना सिखाई जो उनके पिता ‘राम’ ने प्राप्त की थी। यह ध्यान की आठवीं अवस्था थी जिसे ‘नेवसंज्ञा-नासंज्ञायतन’ कहा जाता है (अर्थात: जहाँ न तो संज्ञा/चेतना है और न ही संज्ञा का पूर्ण अभाव)। मूल पालि: “सो खो अहं, भिक्खवे, नचिरस्सेव खिप्पमेव तं धम्मं परियापुणिं… ‘नेवसञ्ञानासञ्ञायतनं सयं अभिञ्ञा सच्छिकत्वा उपसम्पज्ज विहरामी’ति।”
हिंदी अनुवाद: “भिक्षुओं! मैंने शीघ्र ही उस धर्म को सीख लिया… और ‘नेवसंज्ञा-नासंज्ञायतन’ का स्वयं ज्ञान प्राप्त कर, साक्षात्कार कर उसमें विहार करने लगा।” 3. रामपुत्त का सम्मान और प्रस्ताव जब सिद्धार्थ ने इस अत्यंत कठिन अवस्था को पा लिया, तो उद्दक रामपुत्त आश्चर्यचकित रह गए। उन्होंने सिद्धार्थ को अपने गुरु (पिता) के समान मानकर पूरा संघ सौंपने का प्रस्ताव रखा। मूल पालि: “इति यायत्ताय आचरियो अहोसि, सा मे सधम्मचारी अहोसि; यादिसा सधम्मचारी अहोसि, तादिसो मे आचरियो अहोसि। ‘एहि दानि, आवुसो, त्वं इमं गणं परिहरा’ति।”
हिंदी अनुवाद: “(उद्दक ने कहा) ‘जो मेरे आचार्य (पिता) जानते थे, वही तुम जानते हो; जो तुम जानते हो, वही मेरे आचार्य जानते थे। आओ आयुष्मान! अब तुम इस गण (शिष्यों के समूह) का संचालन करो’।” 4. बुद्ध का अंतिम निर्णय (त्याग) इतने बड़े सम्मान के बावजूद सिद्धार्थ संतुष्ट नहीं हुए। उन्होंने गहराई से विश्लेषण किया कि क्या इस सूक्ष्म ध्यान से दुखों का अंत होगा? मूल पालि: “तस्स मय्हं, भिक्खवे, एतदहोसि – ‘नायं धम्मो निब्बिदाय न विरागाय न निरोधाय न उपसमाय न अभिञ्ञाय न सम्बोधाय न निब्बानाय संवत्तति, यावदेव नेवसञ्ञानासञ्ञायतनूपपत्तिया’ति।”
हिंदी अनुवाद: “भिक्षुओं! तब मुझे ऐसा विचार हुआ— ‘यह धर्म निर्वेद, विराग, निरोध, शांति, संबोधि और निर्वाण के लिए नहीं है; यह केवल नेवसंज्ञा-नासंज्ञायतन लोक में जन्म दिलाने वाला है’।” तुलनात्मक निष्कर्ष गुरु - प्राप्त अवस्था - बुद्ध का अनुभव |
आलार कालाम -आकिंचन्यायतन (7वाँ ध्यान) | मन शांत हुआ, पर अहंकार और अविद्या के बीज बने रहे। |
उद्दक रामपुत्त -नेवसंज्ञा-नासंज्ञायतन (8वाँ ध्यान) | एकाग्रता की चरम सीमा थी, पर यह भी जन्म-मरण से मुक्त करने वाला ‘निर्वाण’ नहीं था। |
इन दोनों गुरुओं को छोड़ने के बाद ही सिद्धार्थ उरुवेला गए और स्वयं की खोज शुरू की, जिसे उन्होंने ‘अरिपरियेसन’ (श्रेष्ठ खोज) कहा है।